देहरादून: अवैध कब्जा हटाने के फेर में खुद ही हटा दिए गए रेंजर

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महेंद्र प्रताप सिंह, ऋिषिकेश, उत्तराखंड

  • कुंनाउ गोठ में परमार्थ निकेतन सहित 19 लोगों ने कब्जाई 34 हजार 832 वर्गमीटर वन भूमि
  • गुजर परिवारों को आवंटित लीज भूमि गुपचुप तरीके से खरीदने का खेल, विस्थापित भी रकम लेकर परे हटे

गौहरी रेंज अंतर्गत कुनाउ गोठ में 34 हज़ार 832 वर्गमीटर वन भूमि अवैध कब्जेदारों के हत्थे चढ़ गई है। मजे की बात ये कि जिस रेंजर ने साहस पूर्वक इस वन भूमि से अवैध कब्जा हटवाने की चहलकदमी की वो खुद ही वहां से हटा दिया गया है। हालत ये है कि अवैध कब्जेदारों की सूची देहरादून में बैठे वन विभाग के उच्चाधिकारियों की अनुकंपा की बाट जोह रही है।

दरअसल गौहरी रेंज में वन विभाग की भूमि पर अवैध कब्जे का खेल कई साल से जारी है। गूजरों को विस्थापन के तहत लीज पर आवंटित की गई वन भूमि पर बाहरी लोगों की नजर गड़ी हुई थी। पैसे की लालच में गुजर परिवारों ने लीज की भूमि को अनियमित तरीके से बेच दिया है। ये भी नहीं कहा जा सकता कि जब ये जमीनी घोटाला हो रहा था तो वन विभाग के अफसर खेल से अनभिज्ञ थे। बल्कि बहती गंगा में उन्होंने भी हाथ धोया। यही वजह रही कि जिस जिम्मेदारी को निभाने के लिए उन्हें सरकारी वेतन मिलता है उसी से मुंह मोड़ लिया था। खैर जब शिकायत हुई तो वन विभाग भी सक्रिय हुआ और अवैध कब्जे का सर्वे करने के लिए देहरादून के अफसर भी जंगल की ओर दौड़ पड़े। नतीजा ये रहा कि वन विभाग अपने ही हाथों अपनी नाकामी की इबारत लिख दी। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक गूजरों ने गैर कानूनी तरीके से 34 हज़ार 832 वर्ग मीटर लीज भूमि भूमाफियाओं को बेंच दी। गुजर परिवार रकम लेकर किनारे हो गए और सर्वे की चपेट में अब भूमाफिया फंस गए हैं। इनमें सफेदपोश से लेकर भगवाधारी तक शामिल हैं। कोढ़ में खाज वाली बात तोभये है कि जो वैन भूमि बेची गई है उसकी लीज अवधि भी खत्म हो चुकी है। कब्जेदारों ने वन महकमें की आदत को भांपते हुए इस जमीन पर कब्जा जमाया। उन्हें लगा कि एक बार निर्माण होने के बाद सरकारी अमला आदतन अनाधिकृत कब्जों को भूल जाएगा। फिलहाल सरकारी खतोकिताबत अवैध खरीदफरोख्त के लिए नासूर बन गई है।

 

ये हैं वन भूमि के अवैध कब्जेदार

वन विभाग ने सर्वे के बाद अवैध कब्जेदारों की सूची तैयार की है जिसे राजधानी में बैठे आला अफसरों के पास भी भेजा है। इस सूची में कुछ ऐसे भी नाम हैं जो आये दिन लोगों को अपने सुभाषित वचनों से धन्य करते रहते हैं। जी हां इस सूची में परमार्थ निकेतन का भी अवैध कब्जे दार के रूप में दर्ज है। जरा नजर डालिए किसने कितनी भूमि कब्जाई –

1-राजेश नेगी–1140 वर्ग मीटर
2-हिमानी जोशी–835 वर्गमीटर
3-सुरेश सारस्वत–3393 वर्गमीटर
4-परमार्थ निकेतन-8855 वर्गमीटर
5-आशीष रावत–1350 वर्गमीटर
6-सुरेश कुमार-1716 वर्गमीटर
7-युवराज शर्मा–1567.5 वर्गमीटर
8-भगत सिंह पायल–849.3 वर्गमीटर
9-हब्बल सिंह रावत–894.30 वर्गमीटर
10-सतेंद्र सिंह रावत–894.30 वर्गमीटर
11-दाताराम शर्मा–297.6वर्गमीटर
12-मोहन प्रकाश शर्मा–297.6 वर्गमीटर
13-कन्हैया सिंह भंडारी–600 वर्गमीटर
14-सत्यपाल सिंह राणा–609 वर्गमीटर
15-मनीष अरोड़ा–2691 वर्गमीटर
16-शिवकुमार शर्मा–4216 वर्गमीटर
17-वीरेंद्र पायल–4200 वर्गमीटर
18-कमल सिंह रावत–1267.3 वर्गमीटर
19-पहलवान ( सुरेश शर्मा)–930.25 वर्गमीटर

इस तरह कुल 34 हजार 832 वर्गमीटर वनभूमि अवैध कब्जेदारों की ऐशगाह बनी हुई है। इनमें से परमार्थ निकेतन आश्रम संचालित करता दिखाया गया है जबकि बाकी अवैध कब्जेदार आवास और कृषि कार्य के लिए भूपयोग कर रहे हैं।

 

बोर्ड लगाने से पहले ही रवाना किये गए रेंजर

कुनाउ गोठ में वन भूमि से अवैध कब्जे हटवाने की कोशिशें रेंजर धीर सिंह को महंगी पड़ गईं। दरअसल अवैध रूप से कब्ज जमाये लोग खुद भी जमीनें बेच कर पिंड छुड़ाने की फिराक में थे। इसकी भनक लगते ही रेंजर ने वन भूमि पर विभागीय बोर्ड लगवाने के प्रयास में थे जिससे कोई नए सिरे से ठगी का शिकार न हो। इसी बीच यमकेश्वर विधायक ऋतु खंडूरी के शिकायती पत्र पर राजाजी निदेशक डीके सिंह ने उन्हें मुख्यालय से अटैच कर दिया। अब गौहरी रेंज के कार्यभार हरिद्वार वनाधिकारी के हवाले है। हालांकि कई स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने रेंजर के समर्थन में बेहतरीन कार्यशैली का हवाला देते हुए मुख्यालय को पत्र लिखा है।

 

इन विस्थापितों ने बेंची वन भूमि

जिन गुजर परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार ने वन भूमि आवंटित की वे सबसे होशियार निकले। पहले तो भूमि आवंटन में धांधलेबाजी की बाद में सरकारी भूमि का ही सौदा कर रफूचक्कर हो गए। ऐसे नटवरलालों की सूची इस प्रकार है– वासा, अकबर, गुलाम रसूल, जवाद हुसैन, याकूब अली, गुलाम रसूल (दो बार जमीन आवंटित कराई), मक्खी देवी, याकूब अली (दो बार जमीन आवंटित) और अलीबाज शामिल हैं।

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