Home एचएनएन स्पेशल आलस का भी होता है एक दिन, जानिए क्यों और कैसे मनाते हैं Lazyness Day

आलस का भी होता है एक दिन, जानिए क्यों और कैसे मनाते हैं Lazyness Day

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जरा आप सोचिए कि आप रास्ते से गुजर रहे हों और बीच सड़क पर ही किसी का बैड लगा हो और वो उसपर आराम से अपनी नींद पूरी कर रहा हो। तो आपका रिएक्शन कैसा होगा, वैसा ही न जैसा इस बात को सुनकर आपका रिएक्शन है और अगर आपने उससे शख्स से ये सवाल किया कि आप इस तरह बीच सड़क पर बेड लगाकर क्यों सो रहे हैं तो जवाब में आपको स्ट्रेस आउट करना बाताया जाए तो आप क्या कहेंगे। लेकिन ये फेक्ट हैं। दरअसल 10 अगस्त को ‘वर्ल्ड लेजीनेस डे’ होता है। एक ऐसा देश जो इस दिन को बहुत ही अच्छे तरीके से मानाता है। इस रुप में जैसा कि बाकी और महत्वपर्ण दिवस को मनाया जाता है लेकिन इस दिन वहां के लोग बस आराम फर्माते है वो भी अपना बेड मेन सड़क पर लगाकर।

दरअसल कोलंबिया में लोग गद्दे और बिस्तर लेकर आते हैं और सड़क पर सोते हुए वक्त गुजारते हैं। हर साल इस दिन कोलंबिया का इटैग्यूई शहर आलसियों से भर जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां के लोग तनाव से लड़ने के लिए इस दिन को सेलिब्रेट करते हैं ताकि वो अपनी परेशानियों से बाहर आकर सुकून से वक्त बिता सकें। बता दें कि ये परंपरा 1985 से शुरू हुई थी जब इटैग्यूई के मारियो मोंटोया को ये विचार आया था कि लोगों के पास सिर्फ आराम का भी एक दिन होना चाहिए। वर्ल्ड लेजीनेस डे पर यहां अजब-गजब competition भी होता हैं। कोलंबिया में ‘वर्ल्ड लेजिनेस डे’ के अवसर पर लोग अपने साथ गद्दे और बिस्तर लेकर आते हैं और सड़क पर सोते हुए वक्त गुजारते हैं। इनमें शामिल होने के लिए लोग ना सिर्फ अपने बैडिंग लाते हैं बल्कि उसे रंगबिरंगी लाइट्स और अन्य सामान से सजाते हैं। हर साल इस दिन इटैग्यूई शहर आलसियों से भर जाता है।

अब आप सोच रहे होंगे कि क्या ये लेजीनेस डे सिर्फ कोलंबिया तक ही सिमित है तो आपको बता दें कि भारत के अंदर भी इस दिन को सेलीब्रेट किया जाता है।1932-33 में जब नवाबों का दौर था, उस वक्त भोपाल की आबादी 50 हजार से भी कम थी। यहां के लोग हमेशा बेफिक्र और तफरीह पसंद थे। यहां शेरो-शायरी की महफिलें हुआ करती थीं। उस समय मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी साहब ने राय दी थी कि क्यों न एक ‘काहिलों की अंजुमन’ यानि आलसियों की संस्था बनाई जाए। सभी मौजूद लोगों ने रजामंदी जाहिर की। महफिल में शामिल जनाब जौहर कुरैशी ने अपने मकान का एक हिस्सा इसके लिए खुलवा दिया।

फिर इसका नाम तय हुआ ‘दार-उल-कोहला’ यानी आलसियों का क्लब। इतना ही नहीं, इस क्लब के कायदे-कानून भी तय किए गए। इसके कानून के हिसाब से मेंबरशिप फीस सिर्फ एक तकिया थी। दार-उल-कोहला की सभा का वक्त रात नौ बजे से रात तीन बजे तक था। हर मेंबर को रोजाना हाजिरी देनी थी, चाहे बारिश हो या आंधी तूफान। दार-उल-कोहला में सोने पर पाबंदी लगाई गई थी। लेटा हुआ मेंबर बैठे हुए मेंबर को हुक्म दे सकता था और बैठा हुआ मेंबर खड़े हुए मेंबर को इसके मेंबर भी कोई ऐसे-वैसे लोग नहीं बल्कि शहर के मशहूर अफसर और रियासत में ऊंचा ओहदा रखने वाले लोग थे। यानि के भारत के भीतर भी लेजीनेस डे को मनाया जाता था एक सीमित स्थान पर लेकिन कोलंबिया में पूरी छूट हैं जहां आप इस एक दिन लेजी फिल कर सकते हैं और खुली सड़क के बीच बेड पर आराम फरमा सकते हैं। वजह है इसके पीछे तनाव से लड़ना। हर रोज काम करके आप थक जाते हैं ,मेंटली प्रेशर होता है। लेकिन साल में एक दिन कुछ इस अंदाज में कोलंबिया मनाता है लेजीनेस डे जो की काफी यूनिक है।

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