उत्तर भारत की लाइफलाइन अरावली को क्यों बचाना है जरूरी?

अरावली पहाड़ न सिर्फ पानी और हरियाली देते हैं, बल्कि रेगिस्तान को फैलने से रोकते हैं। यह उत्तर भारत की प्राकृतिक लाइफलाइन हैं।

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 उत्तर भारत की जीवनरेखा

अरावली लगभग 2 अरब साल पुरानी है और यह धरती का जीवंत इतिहास है। इसने महाद्वीपों की हलचल देखी । 

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अरबों साल पुरानी पर्वतमाला

नवंबर 2025 में कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा दी है जिसके तहत कहा कि अब सिर्फ 100 मीटर या उससे ऊंचे पहाड़ ही अरावली माने जाएंगे। 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा 

नई परिभाषा के अनुसार राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही बचेंगे। बाकी पहाड़ खनन और रियल एस्टेट के लिए खुल सकते हैं।

खतरे में अरावली के 90% हिस्से 

नीची पहाड़ियों पर खनन शुरू होने से पानी की सप्लाई घटेगी, मिट्टी खराब होगी और धूल के कारण स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ेंगी। 

खनन से पर्यावरण को नुकसान

#SaveAravalli और #SaveAravallisSaveAQI सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे हैं। ग्रामीण, नागरिक और विपक्षी दल प्रदर्शन कर रहे हैं और लगातार अरावली को बचाने की मांग कर रहे है।

सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया

पर्यावरणविद कहते हैं कि अरावली को केवल ऊंचाई से नहीं मापा जा सकता। निचली पहाड़ियों का महत्व भी उतना ही है। पूरे अरावली क्षेत्र को क्रिटिकल इकोलॉजिकल ज़ोन घोषित किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों की चेतावनी