आईआईटी रुड़की ने बनाया हाई-इको उपकरण
उत्तराखंड स्थित आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने हाई-इको (High-eco) उपकरण विकसित किया है, जो भारत में बाढ़ प्रबंधन और स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में बड़ी क्रांति ला सकता है। यह अपनी तरह का पहला एकीकृत बाढ़-जल गुणवत्ता मॉडलिंग प्लेटफॉर्म है, जो न केवल यह बताता है कि शहरी बाढ़ का पानी किस दिशा और क्षेत्र में फैलेगा, बल्कि यह भी दर्शाता है कि बाढ़ के दौरान हानिकारक रोगाणु व बैक्टीरिया (जैसे ई. कोलाई) किस स्तर तक फैल सकते हैं और किन इलाकों में लोगों के लिए संक्रमण का सबसे ज़्यादा खतरा है। इसका परीक्षण दिल्ली की बाढ़ पर किया गया, जिसमें पाया गया कि लगभग 60% से अधिक प्रभावित क्षेत्र उच्च से अति-उच्च खतरे की श्रेणी में आते हैं। चिंताजनक रूप से, बाढ़ के पानी में मौजूद ई. कोलाई बैक्टीरिया की मात्रा सुरक्षित सीमा से लाखों गुना ज़्यादा थी, जिससे खासकर बच्चों में संक्रमण का खतरा अंतरराष्ट्रीय मानकों से दोगुना से भी अधिक पाया गया। यह तकनीक समय रहते बाढ़ और उससे जुड़े स्वास्थ्य खतरों की भविष्यवाणी कर आपदा प्रबंधन में अहम भूमिका निभा सकती है।
अब बाढ़ और जलजनित रोगों का समय रहते होगा अंदाज़ा
भारत के कई शहरों में मानसून के समय आने वाली बाढ़ गंभीर जल-जनित बीमारियों का कारण बनती है। बाढ़ का पानी अक्सर अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक कचरे के साथ मिलकर एक खतरनाक मिश्रण तैयार कर देता है, जिससे डायरिया, हैजा और कई अन्य संक्रमण तेजी से फैल सकते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने हाई-ईको तकनीक विकसित की है। यह अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म बाढ़ के दौरान पानी में मौजूद संक्रमण फैलाने वाले रोगाणुओं की भविष्यवाणी करता है और बताता है कि किन क्षेत्रों में लोगों के लिए खतरा सबसे अधिक है। हाई-ईको अधिकारियों को समय रहते उच्च जोखिम वाले स्थानों की पहचान करने और त्वरित समाधान अपनाने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, शहरों में मानसून से पहले नालियों की सफाई, सीवेज उपचार प्रणाली को मजबूत करना, एसएमएस अलर्ट के जरिए निवासियों को चेतावनी देना और उन्नत जल-शोधन तकनीक का इस्तेमाल कर बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह तकनीक आने वाले समय में स्वास्थ्य सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में अहम बदलाव ला सकती है।
बाढ़ और स्वास्थ्य संकट से निपटने में मिलेगी मदद
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित हाई-इको (High-eco) तकनीक भारत सरकार के कई महत्वपूर्ण अभियानों में अहम योगदान देगी। यह शोध सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, स्वच्छ भारत मिशन, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को सशक्त बनाने का कार्य करता है। इसके साथ ही, यह तकनीक संयुक्त राष्ट्र के कई सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने में भी कारगर है, जिनमें शामिल हैं — एसडीजी 3 (उत्तम स्वास्थ्य और कल्याण), एसडीजी 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता), एसडीजी 11 (स्थायी शहर और समुदाय) तथा एसडीजी 13 (जलवायु कार्रवाई)। आईआईटी रुड़की के जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग के प्रोफेसर मोहित पी मोहंती का कहना है कि बाढ़ से केवल इमारतों और ढांचों को ही नुकसान नहीं पहुंचता, बल्कि इससे स्वास्थ्य संबंधी बड़े संकट भी खड़े हो सकते हैं। हाई-इको तकनीक हमें यह समझने की सटीक दृष्टि देती है कि सबसे बड़ा खतरा कहां होगा, ताकि बहुत देर होने से पहले ही त्वरित कार्रवाई की जा सके। यह उपकरण आने वाले समय में भारत के स्वच्छता, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन सिस्टम को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।
विज्ञान द्वारा समाज सेवा का आदर्श उदाहरण
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर कमल किशोर पंत ने हाई-इको (High-eco) शोध को विज्ञान द्वारा समाज सेवा का आदर्श उदाहरण बताया है। यह अभिनव तकनीक शहरों को न केवल बाढ़ के दृश्य खतरे (जैसे जलभराव और बुनियादी ढांचे की क्षति) बल्कि छिपे हुए स्वास्थ्य खतरों (जैसे जलजनित बीमारियां) के लिए भी तैयार करती है। हाई-इको का उद्देश्य भारत और दुनिया भर में सुरक्षित, स्वस्थ और जलवायु-लचीले समुदायों का निर्माण करना है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर बाढ़-प्रवण शहरों के लिए भी डिज़ाइन किया गया है। चाहे वह मुंबई हो या मनीला, जकार्ता हो या न्यू ऑरलियंस, हाई-इको एक विज्ञान-आधारित उन्नत समाधान पेश करता है, जो बाढ़ के बाद जलजनित बीमारियों और संक्रमण के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है। इस तरह हाई-इको न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य सुरक्षा और शहरी लचीलापन सुनिश्चित करने का मजबूत उपकरण बन सकता है।
लेखक- शुभम तिवारी (HNN24X7)

