उत्तराखंड में चुनौतीपूर्ण है विकास से शहर और गांवों की तस्वीर संवारने की राह….बढ़ते शहर, निरंतर पलायन….क्या सफल हो पाएगी “भाजपा” ?

उत्तराखंड में चुनौतीपूर्ण है विकास

 

 

 

उत्तराखंड में धामी सरकार ने अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे कर लिए हैं, इन बीते तीन सालों ने धामी सरकार ने कई बड़े और महत्वपूर्ण निर्णयों को लेकर अमिट छाप छोड़ी तो वहीं कई विषयों को लेकर चर्चाओं का केंद्र भी बनी। उत्तराखंड की धामी सरकार को केंद्र का पुरजोर समर्थन है लेकिन बावजूद इसके गांवों और शहरों के संपूर्ण परिपेक्ष्य में अभी भी काफी अधिक विकास किया जाना बाकी है, चूंकी दोनों पक्षों की परिपाटी भिन्न हैं लिहाजा दोनों पक्ष भिन्न-भिन्न तरह के अंगार पर सुलग रहे हैं। शहरी विकास के लिए राज्य सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती है “सुनियोजित विकास”, चूंकी शहर अनियोजित विकास की मार से त्रस्त हैं लिहाजा उनमें आला दर्जे की नागरिक सुविधाएं विकसित करना एक बड़ी चुनौती है। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र पलायन के रोग से ग्रसित है जो थमने का नाम नहीं ले रहा है। राज्य सरकार के समक्ष ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं जुटाना और साथ ही आजीविका के अवसरों को सृजित करना सबसे बड़ी चुनौती है।

 

 

 

बढ़ते शहर , घटती सुविधाएं

 

 

 

 

उत्तराखंड में शहरों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है, लेकिन ये तमाम शहर घटती सुविधाओं का सबब बनते जा रहे हैं। दर्ज आंकड़ों के अनुसार साल 2001 में उत्तराखंड में मात्र 63 शहर थे, वहीं साल 2011 में इनकी संख्या बढ़कर 72 हो गई और वर्तमान समय में उत्तराखंड में कुल 107 शहर मौजूद हैं। राज्य सरकार द्वारा नए शहर घोषित करने की मंशा यह थी कि नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मुहैया करवाई जा सकें परंतु, यह विषय वर्तमान समय पर कितना प्रदिष्ट है यह हम सभी जानते हैं। अगर बात चाहे हल्द्वानी या फिर मसूरी की हो या फिर पर्वतीय शहर नैनीताल व अल्मोड़ा की या फिर हम बात करें उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की, सभी जगह सुनियोजित विकास, सुगम यातायात के साथ बेहतर सड़कें, पार्क और अतिक्रमण मुक्त जमीनें, जल निकासी हो या सीवेज और साफ-सफाई यह सभी विषय मात्र एक शब्द हैं जिन्हे सुव्यस्थित करके स्थापना करना आज भी राज्य सरकार के लिए चुनौतीभरा कार्य बना हुआ है। उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों में विकास का अनुमान मात्र इस बात से लगाया जा सकता है कि नगरीकरण होने के बावजूद भी उत्तराखंड के किसी भी शहर में अब तक सीवेज नेटवर्क से पूरी तरह आच्छादित नहीं हो पाया है।

निरंतर पलायन की भेंट चढ़ रहे गांव

 

 

 

 

उत्तराखंड में मात्र शहर ही अनियोजित विकास की मार से त्रस्त नहीं है अपितु, ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसका उदाहरण साफ दिखाई पड़ता है। वर्तमान समय में कुछ ऐसा ही हाल राज्य के 15906 गांवों का भी है, राज्य के गठन से भी पहले यह पलायन का सिलसिला जारी था जो कि अब तक भी जस का तस है। ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन एक सबसे बड़ा अभिशाप है जिसके कारण वर्तमान समय में उत्तराखंड के गांवों की यह स्थिति हो चुकी है कि पलायन के कारण 1726 गांव पूरी तरह वीरान हो चुके हैं और उत्तराखंड में ऐसे गांवों की बहुत बड़ी तादात है,जिनमें जनसंख्या अंगुलियों में गिनने लायक रह गई है। पलायन आयोग की रिपोर्ट ही बताती है कि राज्य के गांवों से पलायन मजबूरी में हो रहा है। यदि गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य समेत अन्य मूलभूत सुविधाएं ठीक से विकसित हों और आजीविका के अवसर हों तो गांवों की तस्वीर संवरने के साथ ही पलायन भी थमेगा।

 

 

 

 

लेखक- शुभम तिवारी (HNN24X7)

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