उत्तराखंड में बादल फटने की घटना नहीं, वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा; तेज बारिश के कारण हुई तबाही

उत्तराखंड में बादल फटने की घटना नहीं

उत्तराखंड में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा के कारणों को लेकर लोगों में बादल फटने की बात कही जा रही थी, पर मौसम वैज्ञानिकों ने इसे खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि बादल फटने की कोई भी घटना उनके रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई है। मौसम विज्ञान विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, इस सीजन में तेज बारिश हुई है लेकिन बादल फटने जैसा कोई प्रमाण नहीं है। वैज्ञानिक रोहित थपलियाल ने बताया कि आमतौर पर बादल फटना तब माना जाता है जब एक घंटे में 100 मिमी से अधिक बारिश हो, जो इस बार हुई नहीं। अत्यधिक तेज बारिश और सामान्य से ज्यादा वर्षा के कारण पहाड़ी इलाकों में भारी भूस्खलन और बाढ़ की स्थिति बनी, जिससे व्यापक तबाही हुई। अटरिया विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. माधवन नायर राजीवन ने भी इस स्थिति को समझाते हुए कहा कि बादल फटने के लिए तकनीकी मानक और प्रमाण होना जरूरी है, जो इस घटना में मौजूद नहीं थे। राज्य सरकार ने इस आपदा के आर्थिक नुकसान का आकलन 5700 करोड़ रूपये से अधिक बताया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर बादल सच में फटते, तो तबाही और भी गहरी होती। इस भयंकर बारिश ने उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को फिर से रेखांकित कर दिया है।

85 लोगों की मौत, 94 लापता और हजारों मकानों का नुकसान

उत्तराखंड में एक अप्रैल से नौ सितंबर तक जारी प्राकृतिक आपदाओं ने भारी तबाही मचाई है जिसमें अब तक 85 लोगों की मौत हो चुकी है और 94 लोग अभी भी लापता हैं। इस दौरान 3726 मकानों को आंशिक तथा 195 मकानों को गंभीर नुकसान पहुंचा है, जबकि 274 मकान पूरी तरह से ध्वस्त हो गए हैं। प्रदेश में आई इस आपदा ने न केवल जान-माल का भारी नुकसान किया है बल्कि आसपास के वातावरण और जनजीवन को भी गहराई से प्रभावित किया है। सरकारी विभागों ने भी इस आपदा का आर्थिक आकलन 5700 करोड़ रुपये से अधिक रखा है। आपदा प्रबंधन एवं राहत कार्य तेजी से जारी हैं ताकि प्रभावित परिवारों को जल्द से जल्द सुरक्षित पुनर्वास और सहायता मिल सके। यह स्थिति राज्य सरकार और केंद्र सरकार के लिए भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है जिसके लिए कई योजनाएं और सहायता निधि जारी की जा रही हैं।

उत्तराखंड में 22% अधिक बारिश, बारिश के पैटर्न में बदलाव

उत्तराखंड में इस वर्ष सामान्य से 22 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई है। मौसम विभाग के अनुसार एक जून से नौ सितंबर तक प्रदेश में कुल 1299.3 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य वर्षा मात्र 1060.7 मिलीमीटर होती है। खासतौर पर एक सितंबर से नौ सितंबर के बीच यह वृद्धि और भी अधिक स्पष्ट हुई है, जहां सामान्य से 67 प्रतिशत अधिक बारिश हुई। प्रदेश में हिमाचल प्रदेश, पश्चिम उत्तर प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हरियाणा, चंडीगढ़, और दिल्ली की तुलना में अधिक वर्षा हुई है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिला है, जिसके अध्ययन के लिए उत्तरकाशी जिले के गंगोत्री एवं डोकरानी में वाडिया संस्थान द्वारा उपकरण लगाए गए हैं। वाडिया संस्थान के निदेशक विनीत गहलोत के अनुसार, हर्षिल में जिस दिन आपदा आई उस दिन केवल 20 एमएम बारिश हुई जबकि डोकरानी ग्लेशियर क्षेत्र में पांच गुना अधिक बारिश दर्ज की गई। यह आंकड़े बारिश के असामान्य पैटर्न और जलवायु परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं, जो हिमालयी तंत्र और स्थानीय जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं।

 

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लेखक- शुभम तिवारी (HNN24X7)

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