CHHATH PUJA: बिहार की संस्कृति, परंपरा और आस्था का ज़िक्र होते ही सबसे पहले जिस पर्व का स्मरण होता है, वह है छठ पूजा। यह सिर्फ़ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन का दर्शन, पर्यावरण से जुड़ाव और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यही कारण है कि छठ पूजा को बिहार की आत्मा कहा जाता है।
इस वर्ष भी गंगा, सोन, कोसी और बूढ़ी गंडक जैसी नदियों के घाटों पर लाखों श्रद्धालु एकत्रित होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करेंगे। पूरे बिहार का वातावरण लोकगीतों, पूजा के गीतों और आस्था की गूंज से भरा हुआ है।
छठ पूजा का महत्व
छठ पूजा का सबसे बड़ा संदेश है प्रकृति और मानव का संतुलन। इस पर्व में सूर्य देव की पूजा की जाती है, क्योंकि सूर्य को जीवनदायी शक्ति, स्वास्थ्य और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। वहीं, छठी मैया की आराधना संतान की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए की जाती है।
इस पर्व की विशेषता यह है कि इसमें कोई पुरोहित नहीं होता। परिवार की महिलाएँ या पुरुष स्वयं ही पूजा करते हैं। इस पूजा में स्वच्छता, पवित्रता और तपस्या का पालन करना अनिवार्य होता है। व्रती 36 घंटे तक निर्जल और निराहार रहकर उपवास करते हैं और अंत में सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
बिहार से जुड़ाव
छठ पूजा का उद्गम बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की गंगा घाटी से माना जाता है। बिहार की मिट्टी, यहाँ की नदियाँ और यहाँ की कृषि संस्कृति इस पर्व से गहराई से जुड़ी हुई है।
- यहाँ के गाँवों और शहरों में हर साल छठ पर तालाबों, नदियों और पोखरों की सफाई की जाती है।
- लोकगीतों की परंपरा, खासकर महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले “छठ गीत”, इसे और खास बना देते हैं।
- यहाँ का सामाजिक ढांचा भी छठ के समय बदल जाता है—गाँव के हर व्यक्ति, चाहे अमीर हो या गरीब, जाति या धर्म कोई भी हो, सभी एक साथ घाट पर उपस्थित होते हैं।
ऐतिहासिक मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, छठ पूजा की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। कहा जाता है कि जब पांडव अपना राज्य खो चुके थे, तब द्रौपदी ने छठी मैया की पूजा की और उसके बाद उनका संकट टल गया। वहीं, एक मान्यता यह भी है कि सूर्य पुत्र कर्ण छठ पूजा के प्रथम उपासक थे।
ऐतिहासिक दृष्टि से भी बिहार की लोकसंस्कृति में सूर्य पूजा के कई प्रमाण मिलते हैं। यही कारण है कि इस पर्व की जड़ें गहरी और प्राचीन हैं।
पर्व की विधि और क्रम
छठ पूजा चार दिनों का होता है:
- नहाय-खाय (पहला दिन):
व्रती शुद्ध स्नान करके शाकाहारी भोजन बनाते हैं और घर को साफ करते हैं। - खरना (दूसरा दिन):
दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को गुड़ और चावल की खीर, रोटी और फल का प्रसाद खाया जाता है। इसके बाद व्रतियों का 36 घंटे का निर्जल उपवास शुरू हो जाता है। - संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन):
व्रती परिवार और समाज के लोग घाट पर जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। इस दौरान लोकगीत गाए जाते हैं और वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है। - प्रातःकालीन अर्घ्य (चौथा दिन):
अंतिम दिन व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन करते हैं। इसके बाद प्रसाद का वितरण होता है।

लोकगीतों का महत्व
छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता इसके लोकगीत हैं। महिलाएं और बच्चे नदी या तालाब के किनारे बैठकर छठी मैया की आराधना में पारंपरिक गीत गाती हैं।
कुछ लोकप्रिय गीत हैं:
- “केलवा के पत्तवा से कइले बनिहनिया…”
- “उठू हे सूर्य भगवान, अरघ दइले घरे-घरे नारी…”
इन गीतों की गूंज पूरे बिहार के वातावरण को भक्ति और आस्था से भर देती है।
बिहार से विश्व तक
हालांकि छठ पूजा की जड़ें बिहार में हैं, लेकिन आज यह पर्व पूरी दुनिया में मनाया जा रहा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों में बसे बिहारियों के कारण यह पर्व वहां भी धूमधाम से मनाया जाता है।
विदेशों में, खासकर अमेरिका, ब्रिटेन, खाड़ी देशों और मॉरीशस में बसे बिहारवासी इस पर्व को पूरे उत्साह से मनाते हैं।
फिर भी, पटना के गंगा घाट, देव (औरंगाबाद) का सूर्य मंदिर और गांवों के तालाबों पर होने वाली पूजा का भव्य नज़ारा कहीं और देखने को नहीं मिलता।
पर्यावरण और सामाजिक संदेश
छठ पूजा हमें पर्यावरण के संरक्षण का भी संदेश देता है। इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्रियां—जैसे बांस की टोकरी, केले का डंठल, मिट्टी के दीपक और मौसमी फल—सब प्रकृति से जुड़ी और पर्यावरण हितैषी होती हैं।
इसके अलावा यह पर्व सामाजिक समानता का भी प्रतीक है। छठ के घाटों पर अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सभी लोग एक साथ खड़े होकर पूजा करते हैं।
छठ पूजा क्यों सिर्फ बिहार की पहचान बनी?
- यहां यह पर्व सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा बन गया है।
- बिहार की ग्रामीण संस्कृति, लोकगीत और नदियों से जुड़ी परंपराएं इसे विशिष्ट बनाती हैं।
- प्रवासी बिहारियों ने इसे विदेशों तक पहुंचाया, लेकिन बिहार की धरती पर इसकी भव्यता आज भी बेजोड़ है।
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