Durga puja 2025: भारत का सबसे भव्य और रंगीन त्योहार, दुर्गा पूजा, हर वर्ष आश्विन मास में मनाया जाता है। यह केवल धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक मेलजोल का भी प्रतीक है।
देशभर में लाखों लोग माँ दुर्गा की नौ दिनों तक पूजा करते हैं, उनकी आराधना करते हैं और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। यह त्योहार बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों सभी के लिए आनंद और श्रद्धा का अवसर होता है।
दुर्गा पूजा का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
दुर्गा पूजा का मूल उद्देश्य देवी दुर्गा की शक्ति और बुराई पर अच्छाई की जीत को याद करना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा ने महिषासुर जैसे शक्तिशाली राक्षस का वध किया और संसार में धर्म की स्थापना की।
यह त्योहार केवल भक्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि साहस, शक्ति और सच्चाई के सम्मान का भी पर्व है। नवमी और दशमी के दिन विशेष पूजा और भव्य समारोह आयोजित किए जाते हैं।
तैयारी और सजावट
दुर्गा पूजा की तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है। कलाकार, शिल्पकार और डिजाइनर मिलकर पंडाल और मूर्तियां बनाते हैं। पंडालों की सजावट, रोशनी और थीम आधारित डिज़ाइन लोगों को आकर्षित करती हैं।
हर साल नए और अभिनव थीम वाले पंडाल बनाए जाते हैं, जो पर्यावरण और आधुनिकता के साथ पारंपरिक संस्कृति का मेल दर्शाते हैं।

पूजा और आराधना
दुर्गा पूजा नौ दिनों तक मनाई जाती है। पहले आठ दिन देवी के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। भक्त अर्चना, हवन, भजन और कीर्तन में भाग लेते हैं। नवमी और दशमी के दिन विशेष महाआरती और विसर्जन का आयोजन होता है।
दशमी के दिन, जिसे विजया दशमी कहा जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक स्वरूप देवी की मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है।
सांस्कृतिक और सामाजिक उत्सव
आज दुर्गा पूजा केवल पूजा का उत्सव नहीं रह गया है, बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक महोत्सव बन गया है। पंडाल hopping और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान लोग शहर और गांव के विभिन्न पंडालों का भ्रमण करते हैं।
संगीत, नृत्य और नाट्य प्रस्तुतियां इस पर्व को और भी रंगीन बनाती हैं। यह युवाओं और बच्चों को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है।
खाद्य और पारंपरिक व्यंजन
दुर्गा पूजा में विशेष रूप से बंगाली मिठाइयां जैसे रसगुल्ला, सैंडेश और पारंपरिक व्यंजन लोगों में लोकप्रिय हैं। पंडालों में प्रसाद वितरण और सामूहिक भोजन का आयोजन किया जाता है।
यह न केवल भक्ति का हिस्सा है बल्कि सामाजिक एकता और मेलजोल का प्रतीक भी है। परिवार और पड़ोसी मिलकर इस पर्व का आनंद लेते हैं।
पर्यावरण जागरूकता
हाल के वर्षों में पंडाल और मूर्तियों के निर्माण में पर्यावरण का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। पानी और प्लास्टिक का कम उपयोग, प्राकृतिक और इको-फ्रेंडली सामग्री का इस्तेमाल, पर्यावरण-संवेदनशील मूर्तियों का निर्माण – ये सभी पहलु अब दुर्गा पूजा का हिस्सा बन गए हैं। यह बच्चों और युवाओं में पर्यावरणीय जागरूकता पैदा करने का माध्यम भी बन रहा है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान
कोलकाता और अन्य बड़े शहरों में दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन विदेशों में भी लोकप्रिय है। विदेशियों और प्रवासी भारतीयों के बीच यह त्योहार भारतीय संस्कृति और परंपरा की समझ और प्रेम का प्रतीक बन गया है। यह भारत की सांस्कृतिक वैभव और वैश्विक पहचान को मजबूत करता है।
सामाजिक महत्व
दुर्गा पूजा समाज में एकता और सहयोग का संदेश देती है। इस पर्व के दौरान लोग आपसी मतभेद भूलकर मिलकर पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और भोजन का आनंद लेते हैं। यह त्योहार परिवार, समुदाय और पड़ोसियों के बीच भाईचारे और सहयोग की भावना को मजबूत करता है।
आध्यात्मिक अनुभव
भक्ति, संगीत और नृत्य के साथ-साथ दुर्गा पूजा व्यक्ति के आध्यात्मिक अनुभव को भी गहरा करती है। नौ दिन की पूजा, हवन, कीर्तन और आराधना से लोग मानसिक शांति और सुकून महसूस करते हैं। यह पर्व उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और नई उम्मीदें लेकर आता है।

