Dehradun Anganwadi Protest – सीटू से संबद्ध आंगनबाड़ी कार्यकत्री एवं सहायिका कर्मचारी यूनियन के आह्वान पर मंगलवार को आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर गांधी पार्क में प्रदर्शन किया। सभा के बाद यूनियन के प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा। यूनियन ने आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों व सहायिकाओं का मानदेय बढ़ाकर न्यूनतम 26 हजार रुपये करने, राज्य कर्मचारी का दर्जा देने, ग्रेच्युटी व सामाजिक सुरक्षा का लाभ देने, 45 दिन का मातृत्व अवकाश और अतिरिक्त चिकित्सा अवकाश प्रदान करने की मांग की। इसके अलावा अन्य विभागों का कार्य न कराने, अतिरिक्त कार्य के लिए मानदेय देने तथा ग्रीष्मकालीन एवं शीतकालीन अवकाश की सुविधा देने की मांग भी उठाई गई। यूनियन पदाधिकारियों ने कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया जा रहा है।
देहरादून में मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं की आवाज एक बार फिर सड़क पर सुनाई दी। सीटू से संबद्ध आंगनबाड़ी कार्यकत्री एवं सहायिका कर्मचारी यूनियन के आह्वान पर बड़ी संख्या में कार्यकर्ता गांधी पार्क में जुटीं और लंबित मांगों को लेकर प्रदर्शन किया। सभा के बाद यूनियन के प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को ज्ञापन भेजा। आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा मानदेय बढ़ाकर कम से कम 26 हजार रुपये प्रतिमाह करना और आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों व सहायिकाओं को राज्य कर्मचारी का दर्जा देना रहा।
यह प्रदर्शन केवल pay hike तक सीमित नहीं था। यूनियन ने ग्रेच्युटी, सामाजिक सुरक्षा, 45 दिन के मातृत्व अवकाश, अतिरिक्त paid medical leave और स्कूलों की तरह ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन छुट्टियों की मांग भी उठाई। कार्यकत्रियों का कहना है कि बाल विकास विभाग के काम के अलावा उनसे दूसरे विभागों के सर्वे, सत्यापन और अन्य जिम्मेदारियां भी कराई जाती हैं। ऐसी स्थिति में या तो non-departmental काम बंद कराया जाए या उसके लिए अलग मानदेय तय हो। अतिरिक्त आंगनबाड़ी केंद्र की जिम्मेदारी संभालने वाली कार्यकत्रियों को भी extra payment देने की मांग की गई है।
आंगनबाड़ी व्यवस्था बच्चों और महिलाओं तक सरकारी योजनाएं पहुंचाने की अहम कड़ी है। यही कारण है कि काम की जिम्मेदारी और मिलने वाली आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा के बीच का gap अब बड़ा labour issue बनता जा रहा है। यूनियन का आरोप है कि मार्च 2024 के आंदोलन के दौरान मिले आश्वासनों के बावजूद मानदेय से जुड़ा फैसला लंबित है। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शन से पहले ICDS निदेशक के साथ बातचीत में राशन कार्ड सत्यापन का काम न कराने और register व अन्य सामग्री के लिए सालाना दो हजार रुपये देने के निर्देश की बात भी सामने आई। हालांकि मुख्य मांगों पर अंतिम सरकारी निर्णय अभी सामने नहीं आया है। ऐसे में यह प्रदर्शन सरकार के सामने एक practical सवाल रखता है—जिन महिलाओं पर जमीनी योजनाओं की delivery टिकी है, क्या उनके वेतन, छुट्टी और social security के लिए स्पष्ट तथा समयबद्ध policy नहीं होनी चाहिए?
Dehradun Anganwadi Protest में क्या हुआ?
गांधी पार्क में आयोजित सभा में कार्यकत्रियों ने लंबे समय से लंबित मुद्दों पर नाराजगी जताई। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने देहरादून के जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर मांगों पर जल्द और सकारात्मक निर्णय लेने का आग्रह किया। प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन यूनियन ने साफ किया कि सम्मानजनक मानदेय और सामाजिक सुरक्षा अब उनकी सबसे बड़ी priorities हैं।
- न्यूनतम मानदेय 26 हजार रुपये करने की मांग
- आंगनबाड़ी कर्मियों को राज्य कर्मचारी का दर्जा
- ग्रेच्युटी और सामाजिक सुरक्षा का लाभ
- maternity, medical और seasonal leave की सुविधा
- अतिरिक्त विभागीय काम के लिए अलग भुगतान
₹26 हजार Honorarium और State Employee Status क्यों जरूरी?
यूनियन के अनुसार आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां और सहायिकाएं बच्चों के पोषण, शुरुआती शिक्षा, गर्भवती महिलाओं की सहायता, सरकारी data collection और कई welfare schemes के implementation में लगातार काम करती हैं। इसके बावजूद उन्हें नियमित सरकारी कर्मचारी के बजाय मानदेय आधारित कर्मी माना जाता है। इसी असमानता को दूर करने के लिए न्यूनतम 26 हजार रुपये प्रतिमाह और state employee status की मांग रखी गई है।
ग्रेच्युटी का मुद्दा भी अहम है। वर्ष 2022 के Maniben Maganbhai Bhariya मामले में Supreme Court ने आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं के लिए Payment of Gratuity Act की applicability स्वीकार की थी। प्रदर्शनकारी यूनियन चाहती है कि इसका लाभ ground level पर स्पष्ट और समयबद्ध तरीके से मिले। साथ ही 45 दिन का maternity leave, मौजूदा आकस्मिक अवकाश समाप्त होने के बाद 10 दिन का paid medical leave तथा सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान किया जाए। इन मांगों का उद्देश्य केवल income बढ़ाना नहीं, बल्कि काम को सुरक्षित, सम्मानजनक और लंबे समय तक टिकाऊ बनाना है।
Present Situation vs Union Demands: क्या फर्क है?
ज्ञापन में उठाए गए मुद्दे salary से आगे जाकर employment status, leave policy, extra duty और social security तक फैले हैं। नीचे दिया गया comparison यूनियन की ओर से बताई गई मौजूदा स्थिति, उसकी प्रमुख मांगों और उनके संभावित policy impact को आसान तरीके से समझाता है।
| मुद्दा | यूनियन के अनुसार मौजूदा स्थिति | प्रमुख मांग |
|---|---|---|
| मानदेय | मानदेय आधारित भुगतान व्यवस्था | न्यूनतम ₹26,000 प्रतिमाह |
| रोजगार का दर्जा | नियमित राज्य कर्मचारी का दर्जा नहीं | राज्य कर्मचारी घोषित किया जाए |
| छुट्टियां | साल में 20 दिन आकस्मिक अवकाश | 45 दिन maternity leave, 10 दिन paid medical leave और seasonal छुट्टियां |
| अतिरिक्त कार्य | दूसरे विभाग या अतिरिक्त केंद्र का काम | काम बंद हो या अलग मानदेय मिले |
| सामाजिक सुरक्षा | पर्याप्त लाभ नहीं मिलने का आरोप | ग्रेच्युटी और अन्य social security benefits |
Ground-level Work के बावजूद नाराजगी क्यों?
कार्यकत्रियों की नाराजगी का बड़ा कारण workload और payment के बीच का imbalance है। यूनियन का कहना है कि बाल विकास विभाग की core duties के साथ दूसरे विभागों के survey और verification भी दिए जाते हैं। इससे field work बढ़ता है, लेकिन अलग भुगतान या पर्याप्त resources नहीं मिलते। ज्ञापन में यह भी कहा गया कि आंगनबाड़ी केंद्रों की registration व्यवस्था करीब पांच वर्षों से बंद होने के कारण कई कार्यकत्रियों को अपने स्तर पर खर्च करना पड़ रहा है।
यूनियन ने केंद्र का किराया सीधे मकान मालिक के खाते में भेजने के बजाय माता समिति या संबंधित कार्यकत्री के खाते में देने की मांग की। दूसरे केंद्र की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिलने पर separate honorarium और स्कूलों की तर्ज पर summer-winter leave की मांग भी इसी workload concern से जुड़ी है। यदि सरकार विभागवार जिम्मेदारियां, payment rules और leave policy लिखित रूप में तय करती है, तो विवाद कम हो सकते हैं और service delivery भी अधिक व्यवस्थित हो सकती है।
- non-departmental duty की स्पष्ट सीमा तय हो
- अतिरिक्त केंद्र संभालने पर अलग भुगतान मिले
- registration और जरूरी सामग्री का खर्च विभाग उठाए
- छुट्टी और social security की written policy बने
आगे समाधान का रास्ता क्या?
देहरादून के गांधी पार्क में हुआ प्रदर्शन यह दिखाता है कि आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं की मांगें केवल मानदेय बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं। 26 हजार रुपये न्यूनतम मानदेय, राज्य कर्मचारी का दर्जा, ग्रेच्युटी, सामाजिक सुरक्षा, maternity और medical leave, seasonal holidays तथा अतिरिक्त काम का अलग भुगतान—ये सभी मुद्दे उनके काम की शर्तों से सीधे जुड़े हैं। यूनियन ने जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री तक ज्ञापन पहुंचाकर अब सरकार से time-bound action की अपेक्षा जताई है।
समाधान के लिए राज्य सरकार, महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास विभाग और यूनियन प्रतिनिधियों के बीच formal meeting उपयोगी हो सकती है। मांगों की financial और administrative feasibility का आकलन करते हुए एक written roadmap, स्पष्ट timeline और grievance mechanism जारी किया जाना चाहिए। इससे कार्यकत्रियों को भरोसा मिलेगा और पोषण व बाल विकास सेवाओं पर संभावित असर भी रोका जा सकेगा। फिलहाल सभी की नजर सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया और अगले कदम पर रहेगी।
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FAQs: Dehradun Anganwadi Protest
1. आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों का प्रदर्शन कहां हुआ?
प्रदर्शन देहरादून के गांधी पार्क में आयोजित किया गया।
2. कार्यकत्रियों ने कितने मानदेय की मांग की है?
यूनियन ने न्यूनतम 26 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय देने की मांग की है।
3. क्या 26 हजार रुपये मानदेय लागू हो गया है?
नहीं, यह यूनियन की मांग है। सरकार का अंतिम आदेश अभी सामने नहीं आया है।
4. छुट्टियों को लेकर क्या मांग की गई है?
45 दिन के मातृत्व अवकाश, 10 दिन के अतिरिक्त paid medical leave तथा ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन छुट्टियों की मांग की गई है।
5. ज्ञापन किसे भेजा गया है?
यूनियन ने देहरादून के जिलाधिकारी के माध्यम से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा है।

