शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश में कुछ गैर-मान्यता प्राप्त दलों द्वारा कथित तौर पर टिकट बेचे जाने से जुड़े स्टिंग ऑपरेशन की केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच कराने की मांग खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता संगठन को निर्वाचन आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रखने की छूट दी। अदालत ने भरोसा जताया कि आयोग नियमों के तहत शिकायतों के निवारण का प्रयास करेगा।
उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में कुछ गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों द्वारा कथित तौर पर चुनावी टिकट बेचे जाने से संबंधित ‘स्टिंग ऑपरेशन’ की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई करने से मंगलवार को इनकार कर दिया। भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता स्वराज वाहिनी एसोसिएशन को इस मामले में निर्वाचन आयोग के समक्ष लंबित अपने प्रतिवेदन और स्मरण पत्र को दोबारा आगे बढ़ाने की छूट दी। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में याचिकाकर्ता संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग शिकायतों का निवारण करने का प्रयास करेगा, हमें इस बात पर कोई संदेह नहीं है।’’ निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार के अलावा, याचिका में मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा उत्तर प्रदेश की निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल सोनेलाल और जन जनवादी पार्टी सोशलिस्ट को भी पक्षकार बनाया गया था। इससे पहले, सात सितंबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों के कामकाज से संबंधित सोशल मीडिया पर प्रसारित एक स्टिंग ऑपरेशन की सीबीआई या किसी अन्य जांच एजेंसी से जांच कराने के अनुरोध वाली जनहित याचिका खारिज कर दी थी। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए कहा था कि अदालत से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह जनहित के नाम पर पेश किए जाने वाले हर स्टिंग ऑपरेशन या सोशल मीडिया रिपोर्ट की जांच के निर्देश दे।

