US Sanctions Russia Oil

US Sanctions Russia Oil : अमेरिका ने रूस की बड़ी तेल कंपनियों पर लगाया प्रतिबंध

US Sanctions Russia Oil : यूक्रेन में शांति समझौते पर दबाव बनाने के प्रयास में अमेरिका ने रूस की दो प्रमुख तेल कंपनियों, रोसनेफ्ट और लुकोइल, पर प्रतिबंध लगा दिया है। ये दोनों रूस की सबसे बड़ी तेल कंपनियां हैं और अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि ये कंपनियां यूक्रेन पर रूस के हमले को फंडेड कर रही हैं।

प्रतिबंधों के तहत अमेरिका में इन दोनों कंपनियों की सभी संपत्तियों को जब्त किया जाएगा। साथ ही, सभी अमेरिकी कंपनियों को इन कंपनियों के साथ कोई भी व्यापार करने की अनुमति नहीं होगी। इस कदम से रूस की तेल निर्यात क्षमताओं और वैश्विक तेल बाजार पर असर पड़ने की संभावना है।

रिलायंस और रूस के साथ समझौता

 

रिलायंस ने दिसंबर 2024 में रोसनेफ्ट के साथ एक 25 वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत कंपनी प्रतिदिन 5 लाख बैरल तेल आयात करेगी। इसके अलावा, रिलायंस बिचौलियों के माध्यम से भी रूस से तेल खरीदता है। हालांकि, अमेरिका के प्रतिबंधों के बाद इस समझौते पर लंबी अवधि के प्रभाव और रणनीति का आकलन किया जा रहा है।

भारत पर क्या प्रभाव पड़ सकता है

 

रूस के 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण के बाद से भारत रूसी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार बन गया है। पश्चिमी देशों के रुझान हटने के बाद भारत ने भारी छूट के साथ रूस से तेल खरीद का लाभ उठाया है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद सवाल यह उठता है कि क्या भारत पर इसका असर पड़ेगा।

रिपोर्ट्स के अनुसार, रिलायंस इंडस्ट्रीज के रूस से तेल आयात पर इस प्रतिबंध का असर पड़ सकता है। हालांकि सरकारी रिफाइनरियां फिलहाल मध्यस्थ व्यापारियों के माध्यम से खरीद जारी रख सकती हैं। इससे यह स्पष्ट है कि भारतीय तेल कंपनियां अभी भी रूस से कच्चा तेल प्राप्त कर सकती हैं, लेकिन उन्हें अनुपालन जोखिमों का मूल्यांकन करना होगा।

वैश्विक तेल बाजार पर असर

 

दोनों कंपनियां मिलकर प्रतिदिन 31 लाख बैरल तेल का निर्यात करती हैं। रोसनेफ्ट अकेले वैश्विक तेल उत्पादन का 6% और रूस के कुल तेल उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा निर्यात करती है। अमेरिकी प्रतिबंधों से रूस के तेल निर्यात और वैश्विक तेल की कीमतों पर दबाव पड़ने की संभावना है।

अमेरिका के प्रतिबंधों के बावजूद, भारत अभी भी रूस से तेल खरीद जारी रख सकता है, खासकर यूरोपीय बिचौलियों के माध्यम से। रिलायंस और सरकारी रिफाइनरियां अपनी खरीद रणनीतियों का मूल्यांकन कर रही हैं। हालांकि, यह स्थिति वैश्विक तेल बाजार और भारत के तेल आयात पर अस्थायी या दीर्घकालिक असर डाल सकती है।

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