राजधानी में उजड़ता रहा चाय बागान
राजधानी में चाय बागानों की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है, दून के चाय बागान की सैकड़ों बीघा जमीन पर अब भूमाफियाओं की तुती बोलती है। दरअसल, इस सब फर्जीवाड़े की शुरुआत उस वक्त से शुरु हुई जब चाय बागान की आड़ में लाडपुर क्षेत्र में (रिंग रोड) जिन जमीनों को सीलिंग एक्ट से छूट मिली थी, बस फिर क्या था, भूमाफियाओं ने प्रशासन की सैकड़ों बीघा चाय बागान की जमीन पर अपना कब्जा जमा डाला। राजधानी में चाय बागान उजड़ते चले गए और माफिया समेत नेताओं और अफसरों की जेब गर्म और हरी होती चली गई। अब स्थिति यह है कि आज इन जमीनों में दूर-दूर तक चाय की खेती का नामो-निशान नहीं हैं, करीब 350 बीघा क्षेत्रफल पर फैले चाय बागान की भूमि पूरी तरह खुर्द-बुर्द कर दी गई है। प्रशासन की उदासीनता के चलते राजधानी और प्रदेश में भूमाफिया सक्रियता से फल-फूल रहे हैं। आपको बताते चलें कि इस पूरे फर्जीवाड़े के खेल में सबसे रोचक बात तो यह है कि जिस कुंवर चंद्र बहादुर (पुत्र शमशेर बहादुर) के नाम पर चाय बागान को सीलिंग से छूट दी गई थी, उनके नाम के फर्जी दाननामा और वसीयत, पावर आफ अटॉर्नी बनाकर माफिया ही इतने समय से जमीनों को बेचते रहे। हालांकि, 30 बीघा के एक भूखंड में इस फर्जीवाड़े को पकड़ने में जिला प्रशासन कामयाब तो हुआ, लेकिन बावजूद इसके सरकारी तंत्र भी चाय बागान की जमीन को माफियाओं से मुक्त कराने में कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। लगातार बैठ रही जांच में भी आखिर क्यों अब तक भी कोई ठोस कार्रवाई क्यो नहीं करी गई और कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया, यह प्रश्न अपने आप में ही शासन-प्रशासन पर न जाने कितने प्रश्नचिह्म लगाता है।
राजनैतिक स्तर पर चला फर्जीवाड़ा
राजधानी में इस फर्जीवाड़े का यह खेल उस वक्त लाडपुर क्षेत्र में खसरा नंबर 203, 204 और 205 में पकड़ा गया, जब जमीन संतोष अग्रवाल नाम के भूमाफिया ने अपने नाम चढ़ा दी थी। मात्र इतना ही नहीं इस खेल को अंजाम देने के लिए भूमाफिया ने सफेदपोशों की शह पर यह दावा ठोंका कि यह भूमि उनकी मां चंद्रावती की है। भूमाफिया ने कहा कि चंद्रावती ने जमीन कुंवर चंद्र बहादुर से वर्ष 1988 में खरीदी थी और उसी दौरान उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। खेल को अंजाम देने के लिए वर्ष 2019 में चंद्रावती का मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाया गया और वर्ष 2020 में जमीन को मिलीभगत कर संतोष अग्रवाल के नाम दर्ज करा दिया गया। हालांकि, तत्कालीन अपर जिलाधिकारी (प्रशासन)/सीलिंग अधिकारी डा एसके बरनवाल ने स्पष्ट किया कि चाय बागान का स्वरूप समाप्त होते ही या उसके विक्रय के साथ ही जमीन सरकार में निहित हो जाती है। लिहाजा, वर्ष 1988 में की गई बिक्री शून्य है और जमीन को सरकार में निहित कर दिया गया था। इसके बाद यह बात भी सामने आई कि संतोष अग्रवाल की तरह कुमुद वैद्य, आरती कुमार और दीपचंद्र अग्रवाल ने भी चाय बागान की जमीनों पर कब्जे के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए हैं। हालांकि, इसके बाद कुछ समय तक जिला प्रशासन के तत्कालीन अधिकारियों ने सरकार में निहित जमीन पर कब्जा लेने का प्रयास भी किया, लेकिन कुछ समय बाद ही पूरा मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब आलम यह है कि वर्तमान में बेहद कम भूमि ही सरकार के कब्जे में है, अभी भी तमाम निर्माण चाय बागान की भूमि पर गतिमान हैं।
गर्म होती रही नेताओं, माफियाओं और अफसरों की जेब
राजधानी दून में चाय बागान की जमीनों पर निर्बाध कब्जे के लिए भूमाफिओं ने तत्कालीन उस समय की तत्कालीन त्रिवेंद्र सरकार को भी प्रलोभन दिया था। उस समय रिंग रोड पर चाय बागान की जमीन भाजपा प्रदेश संगठन को जमीन बेची गई थी। जिसकी रजिस्ट्री तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल ने करवाई थी। हालांकि, चाय बागान की जमीनों को खुर्द-बुर्द करने का खेल उजागर होने के बाद भाजपा ने इस विवादित जमीन से अपना पल्ला झाड़ लिया था। इसी प्रकार लाड़पुर क्षेत्र में चाय बागान की जमीन पर एक होटल का निर्माण किया गया है, जिसकी पुष्टि साल 2023 में एक प्रशासनिक जांच में हो चुकी है। हालांकि, यह अलग बात है कि प्रशासनिक अधिकारी उस वक्त इस मामले पर कड़ी कार्रवाई करने का साहस जुटाने में सक्षम नहीं हो पा रहे थे और शायद ही वर्तमान व भविष्य में इस दिशा में किसी भी प्रकार की कड़ी कार्रवाई गतिमान हो।
लेखक- शुभम तिवारी (HNN24X7)

