पाकिस्तान :पाकिस्तान के चीन आधारित उद्योगों का निर्यात और कर मुक्त बाजारों की पेशकश को लेकर विवाद फिर से एक विवादास्पद मुद्दा बन गया है।एक किसानों का समूह सरकार से लगभग दस मिलियन टन अतिरिक्त चीनी का निर्यात करने और चीनी व्यवसाय को पूरी तरह से बाजार के आधार पर चलाने का आग्रह कर रहा है।कारण यह है की अतिरिक्त स्टॉक्स का समय से पहले निर्यात करने से चीनी मिलों पर आर्थिक बोझ कम होगा और किसानों को उनकी चीनी फसल के लिए बेहतर कीमतें मिलेंगी। इसके विपरीत सरकार की मुख्य चिंता स्थानीय बाजार में चीनी की कीमतों को नियंत्रित करना है क्योंकि पिछले समय में निर्यात के कारण उनकी कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।
पाकिस्तान में चीनी उद्योग को लेकर फिर बढ़ी बहस

पाकिस्तान में चीनी उद्योग एक बार फिर सरकार और मिल मालिकों के बीच बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। मेरी नजर में इस पूरे विवाद को सिर्फ “चीनी निर्यात की अनुमति” के सवाल के रूप में देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे किसानों की आय, मिलों की आर्थिक स्थिति, घरेलू चीनी कीमतें, सरकारी नियंत्रण और पाकिस्तान की विदेशी मुद्रा जरूरत जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं।
2026 में पाकिस्तान शुगर मिल्स एसोसिएशन (PSMA) ने सरकार से अतिरिक्त चीनी के निर्यात की अनुमति देने की मांग की है। मई में मिल मालिकों ने करीब 10 लाख टन चीनी निर्यात करने की अनुमति मांगी थी। उद्योग का तर्क था कि घरेलू जरूरत से अधिक स्टॉक मौजूद है और यदि इसे समय पर बाहर नहीं भेजा गया तो मिलों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
लेकिन सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज का “सरप्लस” कल घरेलू बाजार की कमी में न बदल जाए।
10 लाख टन चीनी निर्यात की मांग क्यों उठी?
मैंने उपलब्ध आंकड़ों को देखा तो उद्योग की चिंता का एक प्रमुख कारण बढ़ता हुआ स्टॉक दिखाई देता है। जून 2026 में PSMA ने दावा किया था कि पाकिस्तान के पास लगभग 7.9 मिलियन मीट्रिक टन चीनी स्टॉक था, जबकि घरेलू वार्षिक खपत करीब 6.6 मिलियन टन बताई गई। इस आधार पर उद्योग ने लगभग 1.3 मिलियन टन का सरप्लस होने का दावा किया।
मिल मालिकों का कहना है कि अगर गोदामों में चीनी लंबे समय तक पड़ी रहती है, तो उनकी working capital की समस्या बढ़ती है। उनका यह भी तर्क है कि निर्यात से विदेशी मुद्रा प्राप्त हो सकती है और मिलों को किसानों से आने वाली अगली गन्ने की फसल खरीदने में आर्थिक मदद मिल सकती है।
जून में PSMA ने लगभग 500 मिलियन डॉलर की संभावित विदेशी मुद्रा आय का दावा भी किया था। हालांकि यह उद्योग का अनुमान है, इसे सरकारी रूप से प्राप्त निश्चित आय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सिर्फ निर्यात नहीं, पूरी तरह नियंत्रणमुक्त करने की मांग
यहां मुझे इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा चीनी क्षेत्र का पूर्ण deregulation लगता है।
PSMA लंबे समय से चाहता रहा है कि सरकार चीनी की कीमत, आयात और निर्यात में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कम करे और बाजार की मांग तथा आपूर्ति को कीमतें निर्धारित करने की अधिक स्वतंत्रता दे।
PSMA की 2025 की वार्षिक समीक्षा में भी पूरी तरह deregulation की मांग दर्ज है। एसोसिएशन ने चीनी के आयात-निर्यात को उदार बनाने, सरकारी price fixing हटाने और चीनी क्षेत्र में बाजार आधारित व्यवस्था अपनाने की वकालत की थी। रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में प्रांतीय सरकारों ने गन्ने का कोई indicative/minimum price तय नहीं किया था, जिसके बाद गन्ने की कीमतें बाजार परिस्थितियों के अनुसार तय हुईं।
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स (PIDE) ने भी 2024 में तर्क दिया था कि चीनी क्षेत्र में व्यापार प्रतिबंध और सरकारी नियंत्रण supply chain में distortions पैदा करते हैं। हालांकि PIDE का विश्लेषण यह भी दिखाता है कि निर्यात और आयात पर सरकारी प्रतिबंध लंबे समय से इस क्षेत्र का हिस्सा रहे हैं।
सरकार क्यों है सावधान?
यहीं पर उद्योग और सरकार की सोच अलग हो जाती है।
मेरे हिसाब से सरकार की सबसे बड़ी चिंता घरेलू कीमतों की स्थिरता है। पाकिस्तान पहले ऐसा अनुभव कर चुका है जब निर्यात की अनुमति के बाद घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों को लेकर गंभीर दबाव आया।
2024-25 में पाकिस्तान ने लगभग 750,000 टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी। बाद में घरेलू कीमतों में तेज वृद्धि हुई और सरकार को बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए आयात की दिशा में जाना पड़ा। USDA की पाकिस्तान संबंधी रिपोर्ट ने भी पिछले निर्यात निर्णय के बाद घरेलू बाजार में कीमतों पर पड़े दबाव को सरकार के मौजूदा सावधान रुख का एक कारण बताया।
2025 में सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए। जुलाई 2025 में पाकिस्तान के National Food Security & Research मंत्रालय ने बताया था कि सरकार ने sugar pricing और supply chain पर निगरानी बढ़ाई थी तथा artificial price hike और hoarding के खिलाफ कार्रवाई की थी।
इसलिए सरकार के लिए 10 लाख टन निर्यात को मंजूरी देना केवल surplus stock का मामला नहीं है। उसे यह भी देखना होगा कि निर्यात के बाद अगले महीनों में घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी बचती है या नहीं।
2026 में मामला 10 लाख टन से आगे बढ़ गया
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि मई में सामने आई 10 लाख टन निर्यात की मांग के बाद स्थिति लगातार बदलती रही।
जुलाई में PSMA ने करीब 1.3 मिलियन टन surplus का दावा किया था। अगस्त में एसोसिएशन ने फिर चेतावनी दी कि नई crushing season शुरू होने से पहले लगभग 1.197 मिलियन टन अतिरिक्त स्टॉक बच सकता है। उसने पहले चरण में 633,000 टन और उसके बाद 564,000 टन निर्यात की अनुमति देने का प्रस्ताव रखा।
दूसरी ओर, सरकार ने जुलाई में surplus sugar export proposal पर कीमतों में संभावित बढ़ोतरी को लेकर सावधानी दिखाई और प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया।
अगस्त 2026 में Economic Coordination Committee (ECC) ने भी निजी मिलों के 10 लाख टन निर्यात को मंजूरी देने के बजाय Trading Corporation of Pakistan के पास मौजूद 108,000 मीट्रिक टन चीनी के लिए international tender बुलाने के प्रस्ताव पर विचार किया। यह स्टॉक पिछले साल आयात की गई 300,000 टन चीनी में से बचा हुआ था।
इससे साफ है कि सरकार फिलहाल unrestricted export की जगह नियंत्रित और सावधानीपूर्ण approach अपना रही है।
किसानों के लिए क्या मायने रखता है?
चीनी उद्योग की बहस में अक्सर मिल मालिक और उपभोक्ता चर्चा के केंद्र में रहते हैं, लेकिन मेरे विचार से गन्ना किसान सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।
अगर मिलों के पास बहुत ज्यादा stock जमा हो जाता है और उन्हें cash-flow की समस्या होती है, तो इसका असर किसानों को भुगतान करने की क्षमता पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि सरकार निर्यात की अनुमति देकर घरेलू कीमतों को तेजी से बढ़ने देती है, तो उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ सकता है।
2026 में किसानों के कुछ संगठनों ने मिल मालिकों की export demand का विरोध भी किया। उनका तर्क था कि निर्यात से पहले घरेलू बाजार और किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसलिए किसी भी नई नीति में केवल mill profitability को नहीं, बल्कि farmer payment, consumer prices और long-term production efficiency—तीनों को साथ देखना जरूरी है।
क्या पाकिस्तान के लिए पूर्ण deregulation सही रास्ता है?
मैं इसे न तो पूरी तरह गलत मानता हूं और न ही बिना शर्त सही।
एक genuinely competitive sugar market से mills को बेहतर efficiency, investment और export opportunities मिल सकती हैं। बाजार आधारित गन्ना कीमतें किसानों को बेहतर bargaining power भी दे सकती हैं, यदि बाजार में पर्याप्त competition मौजूद हो।
लेकिन deregulation का मतलब केवल सरकारी नियंत्रण हटाना नहीं होना चाहिए। अगर कुछ बड़े खिलाड़ी बाजार पर अत्यधिक प्रभाव रखते हैं, तो consumer protection और competition monitoring भी जरूरी होगी। नवंबर 2025 में Competition Commission of Pakistan ने 10 sugar mills को sugarcane procurement price और crushing start date को लेकर कथित collusion के मामले में show-cause notices जारी किए थे।
इसलिए मेरे अनुसार बेहतर मॉडल “regulated deregulation” हो सकता है—जहां बाजार को अधिक स्वतंत्रता मिले, लेकिन सरकार के पास transparency, competition और food-security के लिए मजबूत safeguards बने रहें।
FAQs
पाकिस्तान चीनी उद्योग को नियंत्रणमुक्त करने की मांग क्यों कर रहा है?
चीनी उद्योग का तर्क है कि बाजार आधारित कीमतों और खुले आयात-निर्यात से efficiency बढ़ेगी, surplus stock का बेहतर प्रबंधन होगा और export earnings बढ़ सकती हैं।
पाकिस्तान ने 10 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी है?
नहीं। 2026 में उद्योग ने करीब 10 लाख टन surplus sugar export करने की मांग की थी, लेकिन इसे unrestricted private-sector export की मंजूरी समझना सही नहीं है। अगस्त 2026 में ECC ने 108,000 टन TCP-held sugar के लिए international tender प्रक्रिया पर विचार किया था।
पाकिस्तान सरकार चीनी निर्यात से क्यों डर रही है?
मुख्य चिंता यह है कि ज्यादा निर्यात से घरेलू supply कम हो सकती है और retail prices बढ़ सकती हैं। पिछले वर्षों में export के बाद कीमतों में तेज वृद्धि होने के कारण सरकार इस बार अधिक सावधानी बरत रही है।
चीनी उद्योग के लिए deregulation का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि चीनी की कीमत, गन्ने की कीमत तथा import-export decisions में सरकारी हस्तक्षेप कम हो और supply-demand तथा market competition को अधिक भूमिका मिले। PSMA लंबे समय से इसी तरह की व्यवस्था की मांग कर रहा है।
निष्कर्ष: 10 लाख टन निर्यात से बड़ा है यह सवाल
पाकिस्तान की चीनी समस्या का समाधान केवल 10 लाख टन चीनी को विदेश भेज देने से नहीं होगा। असली चुनौती यह है कि देश ऐसा sugar market कैसे बनाए जहां किसान को उचित कीमत मिले, मिलें आर्थिक रूप से टिकाऊ रहें और उपभोक्ताओं को चीनी उचित कीमत पर उपलब्ध हो।
मेरी नजर में पूर्ण deregulation तभी सफल हो सकता है जब उसके साथ transparent stock data, real-time monitoring, competition enforcement और घरेलू supply safeguards मौजूद हों।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी से इतना स्पष्ट है कि PSMA surplus sugar के निर्यात और पूरे sugar sector को अधिक स्वतंत्र बनाने पर जोर दे रहा है, जबकि पाकिस्तान सरकार पिछले अनुभवों के कारण domestic prices और food security को लेकर सतर्क है। अगस्त 2026 तक सरकार ने unrestricted 10 लाख टन export की मंजूरी देने के बजाय सीमित और नियंत्रित कदमों पर जोर दिया है।
आगे की नीति इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार आधिकारिक stock position, नई crushing season की production और घरेलू consumption को कैसे balance करती है। यही फैसला तय करेगा कि पाकिस्तान चीनी उद्योग वास्तव में मुक्त बाजार की ओर बढ़ता है या फिर export quotas और सरकारी नियंत्रण की मौजूदा व्यवस्था जारी रहती है।
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