जज रिटायरमेंट उम्र 62 साल :देश की निचली अदालतों में काम करने वाले न्यायिक अधिकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्देश काफी अहम है। अब सात राज्यों में न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल करने का रास्ता साफ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इन राज्यों को अपने सर्विस रूल्स में बदलाव करने का निर्देश दिया है। मेरे लिए इस फैसले की सबसे बड़ी वजह सिर्फ दो साल की अतिरिक्त सेवा नहीं, बल्कि देश की जिला अदालतों में मौजूद जजों की भारी कमी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 30,868 स्वीकृत न्यायिक पदों में से 7,310 पद खाली हैं, यानी करीब 23.68% पदों पर नियुक्ति नहीं है।
किन 7 राज्यों में 62 साल होगी रिटायरमेंट उम्र?

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, सिक्किम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के न्यायिक अधिकारियों से संबंधित है। इन सभी राज्यों ने न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल करने पर सहमति जताई थी। इसके बाद कोर्ट ने इन राज्यों को अपने सेवा नियमों में जरूरी संशोधन करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, इन राज्यों को यह संशोधन जल्द से जल्द और अधिमानतः दो महीने के भीतर पूरा करना होगा। तब तक भी इन राज्यों के ऐसे न्यायिक अधिकारी, जो 60 साल की उम्र पूरी कर चुके हैं, कुछ शर्तों के साथ 62 साल तक सेवा में बने रह सकते हैं।
हालांकि इसे इस तरह समझना सही नहीं होगा कि देश के हर जज की रिटायरमेंट उम्र अब 62 साल हो गई है। यह निर्देश फिलहाल उन सात राज्यों के न्यायिक अधिकारियों के लिए है, जिन्होंने इस बदलाव पर सहमति दी है।
60 से 62 साल करने के पीछे क्या है वजह?
अगर मैं इस फैसले को व्यापक संदर्भ में देखूं, तो इसके पीछे सबसे बड़ा मुद्दा न्यायिक अधिकारियों की कमी और लंबित मामलों का दबाव है।
जुलाई 2026 के आंकड़ों के अनुसार, जिला और अधीनस्थ अदालतों में 30,868 पद स्वीकृत थे, लेकिन सिर्फ 23,558 न्यायिक अधिकारी कार्यरत थे। यानी 7,310 पद खाली थे। यह लगभग एक चौथाई पदों के खाली होने के बराबर है।
ऐसे में अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को 60 साल की उम्र में रिटायर कर देना और फिर उनकी जगह नए अधिकारियों की नियुक्ति और प्रशिक्षण की प्रक्रिया शुरू करना समय लेता है। रिटायरमेंट उम्र में दो साल की बढ़ोतरी से कम से कम अनुभवी अधिकारियों की सेवाओं का इस्तेमाल जारी रखा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी वित्तीय बोझ की आपत्ति को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि रिटायरमेंट उम्र बढ़ने से तत्काल कुछ सेवा खर्च जारी रहेगा, लेकिन दूसरी तरफ नए अधिकारियों की भर्ती, प्रशिक्षण और रिटायरमेंट के बाद की देनदारियों से जुड़े खर्च में भी असर पड़ सकता है।
क्या 60 साल के बाद हर जज को सीधे 62 तक सेवा मिलेगी?
यहां एक जरूरी बात है जिसे समझना बेहद जरूरी है।
62 साल तक सेवा अपने आप नहीं मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब कोई न्यायिक अधिकारी 60 साल की उम्र तक पहुंचेगा, तो संबंधित हाई कोर्ट उसकी suitability और performance का आकलन करेगा। यानी अधिकारी का प्रदर्शन और उपयुक्तता संतोषजनक होने पर ही उसे 62 साल तक सेवा जारी रखने की अनुमति मिलेगी।
मेरे हिसाब से यह प्रावधान महत्वपूर्ण है, क्योंकि रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि हर अधिकारी को बिना किसी समीक्षा के दो साल का स्वतः विस्तार मिल जाए। न्यायिक पदों पर अनुभव के साथ-साथ दक्षता और प्रदर्शन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
31 मार्च 2026 के बाद रिटायर हुए जजों को भी मिलेगा मौका
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एक और महत्वपूर्ण राहत दी है।
इन सात राज्यों के ऐसे न्यायिक अधिकारी जो 31 मार्च 2026 या उसके बाद 60 साल की उम्र पूरी करके रिटायर हो चुके हैं, उन्हें दोबारा न्यायिक सेवा में आने का विकल्प दिया गया है। हालांकि इसके लिए भी कुछ शर्तें हैं।
ऐसे अधिकारियों ने अगर रिटायरमेंट के बाद केंद्र या राज्य सरकार के अधीन कोई दूसरी सरकारी नौकरी या ऐसा पद स्वीकार कर लिया है जिसे ‘office of profit’ माना जाता है, तो वे इस विकल्प का लाभ नहीं उठा सकेंगे।
इसका मतलब यह फैसला केवल भविष्य में 60 साल की उम्र पूरी करने वाले अधिकारियों तक सीमित नहीं है। कुछ हाल में रिटायर हुए अधिकारियों के लिए भी वापसी का रास्ता खोला गया है।
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बाकी राज्यों का क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने केवल इन सात राज्यों की स्थिति पर ही बात नहीं की है। कोर्ट ने उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से भी इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने को कहा है, जिन्होंने अभी तक रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने पर सहमति नहीं दी है।
मसलन, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड ने 60 साल की मौजूदा व्यवस्था बनाए रखने का पक्ष लिया है। पंजाब ने भी अपनी मौजूदा व्यवस्था को सही बताया है, जबकि राजस्थान ने इस मुद्दे पर पुनर्विचार की बात कही है। कुछ अन्य राज्यों में प्रक्रिया अभी विचाराधीन है।
इसलिए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दूसरे राज्य भी 62 साल की उम्र को स्वीकार करते हैं या देश में न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र अलग-अलग बनी रहती है।
क्या हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की उम्र भी बदलेगी?
नहीं। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट उम्र में बदलाव के रूप में नहीं देखना चाहिए।
यह मामला मुख्य रूप से जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों से जुड़ा है। सामान्य व्यवस्था में हाई कोर्ट के न्यायाधीश 62 साल और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश 65 साल की उम्र में सेवानिवृत्त होते हैं।
यानी खबर में इस्तेमाल होने वाला “जज” शब्द व्यापक है, लेकिन कानूनी रूप से यह फैसला मुख्यतः subordinate/district judiciary के अधिकारियों पर लागू हो रहा है।
क्या इससे आम लोगों को जल्दी न्याय मिलेगा?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।
सिर्फ रिटायरमेंट उम्र बढ़ा देने से अदालतों में लंबित मामलों की समस्या खत्म नहीं होगी। लेकिन अगर अनुभवी न्यायिक अधिकारी दो साल अतिरिक्त काम करते हैं और साथ ही खाली पदों को भी तेजी से भरा जाता है, तो न्यायिक व्यवस्था पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।
आज जिला अदालतें आम नागरिक के लिए न्याय व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तर हैं। जमीन, संपत्ति, पारिवारिक विवाद, आपराधिक मामले और कई दूसरे मुकदमों में आम व्यक्ति का पहला संपर्क इन्हीं अदालतों से होता है।
इसलिए मेरे नजरिए से जजों की संख्या बढ़ाना, खाली पद भरना, अदालतों की आधारभूत सुविधाएं बेहतर करना और तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना—इन सभी कदमों को साथ लेकर चलना होगा।
क्या रिटायरमेंट उम्र बढ़ाना स्थायी समाधान है?
मेरी नजर में यह तत्काल राहत का उपाय जरूर है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं।
अगर 7,310 से ज्यादा पद खाली हैं, तो केवल मौजूदा अधिकारियों को दो साल अतिरिक्त सेवा देने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। नई नियुक्तियों की प्रक्रिया तेज करनी होगी और न्यायिक सेवा में प्रतिभाशाली उम्मीदवारों को समय पर नियुक्त करना होगा। जुलाई 2026 के आंकड़ों में जिला अदालतों में करीब 23.68% पद खाली पाए गए थे।
साथ ही, नियुक्ति प्रक्रिया में देरी कम करना और अदालतों में कर्मचारियों व तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाना भी जरूरी है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव है। छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, सिक्किम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल करने का रास्ता साफ हो चुका है। हालांकि 60 साल की उम्र के बाद सेवा जारी रखना हाई कोर्ट की suitability और performance assessment से जुड़ा रहेगा।
मेरे लिए इस फैसले का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की सेवाओं का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकेगा। लेकिन अगर सरकारें खाली पदों को भरने और नई नियुक्तियों की प्रक्रिया को तेज नहीं करतीं, तो केवल दो साल की अतिरिक्त सेवा लंबे समय की न्यायिक देरी का समाधान नहीं बन पाएगी।
आखिरकार, न्यायपालिका में सिर्फ ज्यादा उम्र तक काम करने वाले जज नहीं, बल्कि पर्याप्त संख्या में सक्षम और स्वतंत्र न्यायिक अधिकारी चाहिए। यही बदलाव आम नागरिक को समय पर न्याय दिलाने में सबसे ज्यादा मायने रखेगा।
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