सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक नोटिस जारी किया है। यह नोटिस दिल्ली पुलिस के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर दिया गया है, जिसके तहत जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगहों की सूची से हटा दिया गया था। कोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा है कि जंतर-मंतर को इस सूची से हटाने का फैसला क्या कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों के आधार पर लिया गया था, या फिर सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन स्थल के रूप में इस जगह की उपयोगिता के स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर आधारित नहीं था। उन्होंने कहा कि पहले गठित एक समिति ने इस मामले की जांच की थी और एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कानून लागू करने वाली एजेंसियों को दिल्ली विरोध प्रदर्शनों से जुड़े सभी CCTV फुटेज और अन्य डिजिटल सामग्री को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। साथ ही, निजी पक्षों को भी वीडियो सुरक्षित रखने और उन्हें सबूत के तौर पर अदालत में पेश करने की अनुमति दी है। अदालत ने सरकार से यह भी पूछा कि जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में हटाए जाने का फैसला क्या सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों पर आधारित था, या फिर सार्वजनिक प्रदर्शनों के लिए उस जगह की उपयोगिता का अलग से आकलन किया गया था? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर आधारित नहीं था, बल्कि पहले गठित एक समिति ने इस मामले की जांच की थी और एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी किया है। इस धारा के तहत लोगों को पुलिस अधिकारियों द्वारा दिए गए कानूनी निर्देशों का पालन करना होता है, और जो लोग इन निर्देशों को नहीं मानते, उन्हें पुलिस हिरासत में ले सकती है या गिरफ्तार कर सकती है।

