Youth protesters march during a Jharkhand recruitment exam protest carrying posters and the Indian national flag

झारखंड भर्ती परीक्षाओं का विवाद: युवाओं के गुस्से के पीछे सिर्फ एक परीक्षा नहीं, रोजगार का बड़ा संकट

झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहा आंदोलन अब केवल किसी एक परीक्षा को रद्द कराने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। 14वीं झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच, कई परीक्षाओं को रद्द करने की मांग और सीबीआई जांच की मांग ने राज्य में भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जुलाई से चल रहे विरोध के बीच मामला और गंभीर हुआ है। 10 अगस्त को रांची में विधानसभा की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। Reuters के अनुसार, पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस, लाठी और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया। प्रदर्शन 25 जुलाई से जारी है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को केवल राजनीतिक टकराव के रूप में देखना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि जब किसी युवा के लिए सरकारी नौकरी वर्षों की तैयारी, आर्थिक खर्च और परिवार की उम्मीदों का परिणाम हो, तब भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा होने का असर कितना गहरा होता है।

परीक्षा विवाद से व्यवस्था पर उठे सवाल

14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा को लेकर शिकायतों के बाद झारखंड CID ने जांच शुरू की। जांच के दौरान JPSC के तत्कालीन अध्यक्ष और पूर्व मुख्य सचिव एल. खियांग्ते के आवास की भी तलाशी ली गई। इससे पहले मामले में JPSC की तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता और परीक्षा से जुड़ी आउटसोर्सिंग एजेंसी के कर्मचारियों समेत कई लोगों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई थी।

खियांग्ते ने अपने इस्तीफे को निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया कदम बताया था। उन्होंने जांच में सहयोग करने की बात कही थी।

इन घटनाओं का अर्थ यह नहीं है कि परीक्षा में लगे हर व्यक्ति पर आरोप सिद्ध हो गए हैं। जांच और अदालत की प्रक्रिया पूरी होने तक कथित अनियमितताओं को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन जांच, गिरफ्तारियां और आयोग के शीर्ष स्तर पर बदलाव इस बात के संकेत हैं कि मामला सामान्य प्रशासनिक शिकायत से आगे बढ़ चुका है।

सरकार ने कुछ मांगें मानीं, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में 14वीं JPSC परीक्षा को रद्द करना, 2023 और 2025 की बैकलॉग परीक्षाओं पर कार्रवाई तथा अन्य भर्ती परीक्षाओं की जांच शामिल रही है।

इस बीच राज्य सरकार ने 14वीं JPSC परीक्षा और बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला किया है। हालांकि Jharkhand Staff Selection Commission (JSSC) Combined Graduate Level 2024 परीक्षा को रद्द करने की मांग पर सरकार सहमत नहीं हुई है। रिपोर्टों के मुताबिक सरकार का तर्क है कि इस प्रक्रिया से चयनित बड़ी संख्या में उम्मीदवार पहले ही नियुक्त होकर सेवा में आ चुके हैं।

यही वह बिंदु है जहां सरकार और अभ्यर्थियों के बीच भरोसे का संकट दिखाई देता है। एक तरफ परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर सवाल हैं, दूसरी तरफ पहले से नियुक्त उम्मीदवारों के भविष्य को अचानक अनिश्चित बनाने की समस्या है। किसी भी फैसले में दोनों पक्षों के अधिकारों का संतुलन आसान नहीं होगा।

क्यों सरकारी नौकरी का मुद्दा इतना संवेदनशील है?

भारत में सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए एक परीक्षा सिर्फ परीक्षा नहीं होती। कई उम्मीदवार वर्षों तक एक ही भर्ती चक्र पर निर्भर रहते हैं। उम्र सीमा, परीक्षा शुल्क, कोचिंग, यात्रा और तैयारी पर खर्च होने वाला समय इस प्रक्रिया को व्यक्तिगत और आर्थिक दोनों स्तरों पर महंगा बना देता है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी रोजगार का दबाव युवाओं के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। सरकार के 2025 के Periodic Labour Force Survey के अनुसार, 15-29 वर्ष आयु वर्ग में सामान्य स्थिति के आधार पर बेरोजगारी दर 9.9% थी। वहीं माध्यमिक या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में बेरोजगारी दर 6.5% रही।

इन आंकड़ों को सीधे झारखंड के परीक्षा विवाद का कारण नहीं कहा जा सकता, लेकिन वे उस व्यापक रोजगार संदर्भ को समझने में मदद करते हैं जिसमें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए युवाओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।

आंदोलन में राजनीति भी आई, लेकिन मुद्दा उससे बड़ा है

झारखंड में आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिला है। भाजपा और अन्य संगठनों ने सरकार पर दबाव बढ़ाया है, जबकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आंदोलन के राजनीतिकरण को लेकर आपत्ति जताई है। हालिया विरोध के दौरान भाजपा और छात्र संगठनों की गतिविधियां भी तेज हुई हैं।

राजनीतिक दलों की मौजूदगी किसी भी बड़े छात्र आंदोलन की दिशा को प्रभावित कर सकती है। लेकिन इससे अभ्यर्थियों की मूल शिकायत अपने आप राजनीतिक नहीं हो जाती। परीक्षा की पारदर्शिता, समय पर परिणाम, निष्पक्ष जांच और नियुक्ति की निश्चित प्रक्रिया ऐसे मुद्दे हैं जिनका समाधान सरकार बदलने से अधिक संस्थागत सुधारों पर निर्भर करता है।

झारखंड के पास पहले से कानून भी है

परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर रोक लगाने के लिए झारखंड में 2023 में एक विधेयक लाया गया था। इसमें प्रश्नपत्र की अनधिकृत प्राप्ति या खुलासा, परीक्षा केंद्र में प्रतिबंधित गतिविधियां और अन्य अनुचित साधनों के लिए सजा तथा परीक्षा से वंचित करने जैसे प्रावधान प्रस्तावित किए गए थे।

इससे एक अहम सवाल पैदा होता है: कानून मौजूद होने के बावजूद भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी की शिकायतें क्यों बार-बार सामने आती हैं?

इसका जवाब केवल कठोर सजा में नहीं है। परीक्षा कराने वाली एजेंसियों की चयन प्रक्रिया, प्रश्नपत्र की सुरक्षा, डिजिटल सिस्टम, जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था, शिकायतों की स्वतंत्र जांच और परिणाम जारी करने की पारदर्शिता—इन सभी स्तरों पर भरोसे की जरूरत होती है।

सबसे बड़ी कीमत अभ्यर्थी चुका रहा है

भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी साबित होने या परीक्षा रद्द होने का सीधा असर उस छात्र पर पड़ता है जिसने महीनों या वर्षों तैयारी की होती है। परीक्षा दोबारा होने पर उम्र सीमा, आर्थिक क्षमता और मानसिक दबाव जैसे सवाल सामने आते हैं।

दूसरी ओर, यदि किसी परीक्षा में वास्तव में गंभीर अनियमितता हुई हो और उसे केवल इसलिए बरकरार रखा जाए कि कुछ उम्मीदवारों की नियुक्ति हो चुकी है, तो इससे पूरी भर्ती व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो सकता है। इसलिए सरकार के सामने चुनौती सिर्फ परीक्षा रद्द करने या बचाने की नहीं है; उसे यह तय करना होगा कि न्याय किस तरह किया जाए ताकि निर्दोष चयनित उम्मीदवारों और शिकायत करने वाले अभ्यर्थियों—दोनों के अधिकार सुरक्षित रहें।

आगे क्या देखना महत्वपूर्ण होगा?

अब तीन स्तरों पर घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेगा।

पहला, CID जांच किन निष्कर्षों तक पहुंचती है और क्या कथित अनियमितताओं की जिम्मेदारी तय होती है। दूसरा, रद्द की गई परीक्षाओं की नई प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और समयबद्ध होती है। तीसरा, JSSC CGL 2024 जैसे विवादित मामलों में सरकार और अदालतें नियुक्त उम्मीदवारों तथा अन्य अभ्यर्थियों के हितों के बीच किस तरह संतुलन बनाती हैं।

झारखंड का मौजूदा आंदोलन अंततः केवल एक परीक्षा का विवाद नहीं है। यह उस भरोसे की परीक्षा है जिस पर सरकारी भर्ती व्यवस्था टिकी होती है। युवा यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनकी मेहनत का परिणाम परीक्षा केंद्र के बाहर किसी अनियमितता, लापरवाही या प्रशासनिक विफलता से तय न हो।

सरकार के लिए भी यही सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होगी: क्या वह आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानती है, या इसे भर्ती व्यवस्था में भरोसा बहाल करने के अवसर के रूप में देखती है?

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