उत्तराखंड की Nanda Devi Yatra 2026 इस समय फिर चर्चा में है। मां नंदा देवी की बड़ी जात 5 सितंबर 2026 को चमोली जिले के सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश-होमकुंड की ओर रवाना हो चुकी है। यात्रा में डोली, छंतोलियां, स्थानीय देवी-देवताओं के प्रतीक, श्रद्धालु और पारंपरिक वाद्ययंत्र शामिल हैं। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 20 सितंबर को यात्रा होमकुंड पहुंचेगी, जहां मां नंदा की विशेष पूजा और चौसिंग्या खाडू की विदाई होगी। इसके बाद वापसी यात्रा चलेगी और 30 सितंबर को समापन प्रस्तावित है।
हालांकि यहां एक जरूरी अंतर समझना बेहद महत्वपूर्ण है। नौटी से होने वाली पारंपरिक मुख्य नंदा देवी राजजात को 2026 में स्थगित कर 2027 में कराने का निर्णय लिया गया है। वहीं कुरुड़ से जुड़ी बड़ी जात 2026 में आयोजित की जा रही है। इसलिए 2026 की यात्रा को सीधे 12 साल में होने वाली पारंपरिक नौटी राजजात कहना सही नहीं होगा।
Nanda Devi Yatra 2026 कब और कहां से शुरू हुई?

2026 की बड़ी नंदा जात 5 सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़, चमोली से शुरू हुई। यात्रा का अंतिम महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ाव होमकुंड है। कार्यक्रम के अनुसार 20 सितंबर को यहां पूजा-अर्चना के बाद चौसिंग्या खाडू को कैलाश की ओर विदा किया जाएगा। वापसी के बाद 30 सितंबर को कुरुड़ क्षेत्र में यात्रा की पूर्णाहुति निर्धारित है।
इस यात्रा में कई आबादी वाले और दुर्गम निर्जन पड़ाव आते हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार 2026 की बड़ी जात का पैदल मार्ग लगभग 296 किलोमीटर तक बताया गया है, जबकि पारंपरिक राजजात के लिए सरकारी स्रोत लगभग 280 किलोमीटर और 18 दिनों की यात्रा का उल्लेख करते हैं। अलग-अलग संस्करणों में दूरी की गणना मार्ग और पड़ावों के आधार पर अलग हो सकती है।
Nanda Devi Raj Jat और Badi Jat में क्या अंतर है?
यही 2026 का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
नंदा देवी राजजात परंपरागत रूप से हर 12 वर्ष में होने वाली बड़ी धार्मिक यात्रा है। इसका ऐतिहासिक मुख्य प्रारंभिक केंद्र नौटी माना जाता है और पारंपरिक यात्रा होमकुंड तक जाती है। चमोली जिला प्रशासन भी 2014 को पिछली राजजात के रूप में दर्ज करता है।
2026 में नौटी से जुड़ी राजजात समिति ने मुख्य यात्रा को स्थगित कर 2027 में आयोजित करने का फैसला किया। इसके पीछे धार्मिक कैलेंडर, मौसम, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यात्रा की कठिनाई और श्रद्धालुओं की सुरक्षा जैसे कारणों पर विचार किया गया।
दूसरी तरफ, कुरुड़ से बड़ी जात 2026 में आयोजित की गई। इसलिए 2026 को नंदा परंपरा के लिहाज से एक असाधारण वर्ष माना जा सकता है—एक ओर पारंपरिक नौटी राजजात 2027 की ओर बढ़ी, वहीं कुरुड़ की बड़ी जात इसी साल निकली।
नंदा देवी को मायके से कैलाश क्यों विदा किया जाता है?
नंदा देवी को उत्तराखंड के कई हिस्सों में घर की बेटी के रूप में देखा जाता है। स्थानीय धार्मिक कल्पना में उनका मायका हिमालयी क्षेत्र है और उनका ससुराल भगवान शिव का कैलाश।
इसलिए नंदा देवी की यात्रा केवल मंदिर से दूसरे मंदिर तक जाने वाली यात्रा नहीं है। यह बेटी की विदाई की भावनात्मक परंपरा है।
देवी को डोली में बैठाया जाता है। उनके लिए कपड़े, आभूषण, खाद्य सामग्री और अन्य प्रतीकात्मक उपहार रखे जाते हैं। जिस तरह उत्तराखंड के पहाड़ी समाज में बेटी को विवाह के बाद मायके से विदा किया जाता है, उसी भाव को देवी की यात्रा में धार्मिक रूप दिया गया है। IGNCA के सांस्कृतिक विवरण में भी राजजात को नंदा देवी की मायके से ससुराल जाने की प्रतीकात्मक यात्रा बताया गया है।
इसी वजह से यात्रा के दौरान स्थानीय महिलाओं और परिवारों की भावनात्मक भागीदारी बहुत गहरी होती है।
Nanda Devi Yatra का इतिहास कितना पुराना है?
नंदा देवी की पूजा गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में लंबे समय से होती रही है। लेकिन राजजात की शुरुआत की सटीक ऐतिहासिक तारीख को लेकर अलग-अलग परंपराएं और मान्यताएं मिलती हैं।
स्थानीय परंपराओं में इसे प्राचीन राजवंशों से जोड़ा जाता है। नौटी, कांसुवा के राजवंशी परिवार और नंदा देवी के पारंपरिक पुजारियों की भूमिका इस यात्रा की संस्थागत संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। IGNCA के अनुसार नौटी में नंदा देवी की परंपरा से जुड़े पवित्र श्रीयंत्र और पारंपरिक पूजा व्यवस्था का विशेष महत्व है।
कुछ स्थानीय ऐतिहासिक परंपराएं इसकी शुरुआत को 7वीं या 9वीं शताब्दी के राजाओं से जोड़ती हैं। हालांकि इन दावों को पूरी तरह आधुनिक दस्तावेजी इतिहास के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय लोकपरंपरा और धार्मिक इतिहास के रूप में देखना अधिक उचित है।
सरकारी सांस्कृतिक स्रोत यह जरूर स्पष्ट करते हैं कि राजजात की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और इसे लगभग हर 12 वर्ष में आयोजित किया जाता है।
12 साल में एक बार क्यों होती है राजजात?
नंदा देवी को अपने मायके आने वाली बेटी के रूप में देखा जाता है। लोकविश्वास के अनुसार कुछ समय मायके में रहने के बाद उनकी विदाई कैलाश के लिए होती है।
इसी धार्मिक चक्र के कारण राजजात को 12 साल के अंतराल पर आयोजित करने की परंपरा बनी। इस दौरान अलग-अलग क्षेत्रों की डोलियां और देवी-देवताओं के प्रतीक यात्रा में जुड़ते हैं।
चमोली जिला प्रशासन के अनुसार पिछली बड़ी राजजात 2014 में हुई थी। इसलिए अगली पारंपरिक राजजात का समय 2026 के आसपास बनता था, लेकिन 2026 की मुख्य नौटी राजजात को अब 2027 के लिए टाल दिया गया है।
चौसिंग्या खाडू क्या है और इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
चौसिंग्या खाडू, यानी चार सींग वाला मेढ़ा, नंदा यात्रा की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक है।
2026 की बड़ी जात में सुंग गांव से जुड़े चौसिंग्या खाडू को यात्रा का प्रमुख धार्मिक प्रतीक बनाया गया है। रिपोर्टों के अनुसार यह खाडू यात्रा में मां नंदा की डोली के आगे चलता है।
कुमाऊं मंडल की आधिकारिक वेबसाइट भी राजजात में चार सींग वाले मेढ़े की भूमिका का उल्लेख करती है और बताती है कि वह यात्रा का नेतृत्व करता है।
होमकुंड पहुंचने पर इस खाडू को देवी के लिए प्रतीकात्मक भेंटों के साथ कैलाश की दिशा में विदा किया जाता है। यह दृश्य पूरी यात्रा के सबसे भावुक और धार्मिक क्षणों में माना जाता है।
Nanda Devi Yatra 2026 का Route क्या है?
2026 की बड़ी जात के प्रमुख पड़ावों में कुरुड़, रामणी, आला, सितेल, कनोल, वाण, लाटू क्षेत्र, रणकधार, गैरोली पातल, बेदनी बुग्याल, पातर नचौणियां, रूपकुंड, ज्योरागली, शिलासमुद्र और होमकुंड शामिल हैं।
यात्रा के कुछ हिस्से गांवों से गुजरते हैं, जबकि बाद का हिस्सा बेहद ऊंचे और कठिन हिमालयी भूभाग में पहुंच जाता है।
विशेष रूप से बेदनी बुग्याल, रूपकुंड और शिलासमुद्र यात्रा के सबसे कठिन और चर्चित हिस्सों में आते हैं।
प्रमुख तारीखें
| तारीख | प्रमुख कार्यक्रम |
|---|---|
| 5 सितंबर 2026 | कुरुड़ से बड़ी जात का शुभारंभ |
| 12 सितंबर | रामणी क्षेत्र में प्रमुख देवी-देवताओं का मिलन |
| 15 सितंबर | वाण/लाटू क्षेत्र की ओर यात्रा |
| 18 सितंबर | बेदनी बुग्याल और सप्तमी पूजा |
| 19 सितंबर | रूपकुंड-ज्योरागली-शिलासमुद्र क्षेत्र |
| 20 सितंबर | होमकुंड में पूजा और चौसिंग्या खाडू की विदाई |
| 21–29 सितंबर | वापसी यात्रा |
| 30 सितंबर | कुरुड़ में समापन/पूर्णाहुति कार्यक्रम |
2026 के कार्यक्रम की विभिन्न रिपोर्टों में कुछ पड़ावों के नाम या दूरी की गणना में मामूली अंतर मिलता है, इसलिए इसे यात्रा का प्रमुख कार्यक्रम समझना चाहिए, न कि हर दिन के मार्ग की अंतिम प्रशासनिक अधिसूचना।
यात्रा में उत्तराखंड की कौन-कौन सी संस्कृति दिखाई देती है?
Nanda Devi Yatra केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह गढ़वाल और कुमाऊं की लोक-संस्कृति का बड़ा मंच भी है।
यात्रा के दौरान कई पारंपरिक तत्व देखने को मिलते हैं:
- ढोल-दमाऊं जैसे पारंपरिक वाद्य
- नंदा देवी के जागर और लोकगीत
- देवी की डोली और छंतोलियां
- स्थानीय देवी-देवताओं के प्रतीक
- पारंपरिक पहाड़ी भोजन
- ग्रामीण सामुदायिक आतिथ्य
- स्थानीय मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन
- प्रवासी उत्तराखंडियों की अपने गांवों में वापसी
कुमाऊं मंडल की आधिकारिक जानकारी में नंदा उत्सवों से जुड़े पूजा, नृत्य और ब्रह्मकमल संग्रह जैसी परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है।
रामणी का सांस्कृतिक मेला क्यों महत्वपूर्ण है?
2026 की बड़ी जात के दौरान रामणी में 11 से 13 सितंबर तक तीन दिवसीय लोक सांस्कृतिक पर्यटन विकास मेला आयोजित किया जा रहा है।
यह केवल श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक पड़ाव नहीं है, बल्कि स्थानीय लोक-संगीत, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर है। यात्रा के कारण प्रवासी लोग अपने गांवों में लौटते हैं और स्थानीय बाजारों तथा सामुदायिक गतिविधियों में भी तेजी आती है।
हक-हकूकधारी कौन होते हैं?
नंदा देवी यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक विशेषताओं में से एक है हक-हकूकधारी व्यवस्था।
यात्रा से जुड़े विभिन्न गांवों और समुदायों की पारंपरिक जिम्मेदारियां निर्धारित होती हैं। एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक देवी की डोली पहुंचाने, श्रद्धालुओं के लिए भोजन-पानी और ठहरने की व्यवस्था करने जैसी जिम्मेदारियां स्थानीय समुदाय निभाते हैं।
यानी यह आयोजन केवल किसी एक मंदिर समिति का कार्यक्रम नहीं है। पूरे गांवों की सामूहिक भागीदारी इसकी पहचान है।
नंदा देवी यात्रा में महिलाएं और “धियाणियां” क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तराखंड की लोकभाषा में धियाणियां यानी विवाहित बेटियां नंदा देवी की परंपरा से गहराई से जुड़ी हैं।
नंदा को बेटी मानने के कारण जब बड़ी जात या राजजात निकलती है, तो कई विवाहित बेटियां अपने मायके लौटती हैं। यह वापसी सिर्फ धार्मिक भागीदारी नहीं बल्कि पहाड़ी समाज में मायके और बेटी के रिश्ते को फिर से जीवंत करने वाला सामाजिक अवसर भी है।
2026 की बड़ी जात के लिए भी देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले प्रवासी और धियाणियों के अपने गांव लौटने की खबरें सामने आईं।
बेदनी बुग्याल और रूपकुंड का क्या महत्व है?
यात्रा का ऊंचाई वाला हिस्सा इसे सामान्य धार्मिक यात्रा से अलग बनाता है।
बेदनी बुग्याल हिमालय के प्रसिद्ध alpine meadows में से एक है। इसके बाद यात्रा और अधिक दुर्गम भूभाग की ओर बढ़ती है।
रूपकुंड अपने रहस्यमय मानव अवशेषों के कारण दुनिया भर में चर्चित है। लेकिन नंदा देवी यात्रा में इसका महत्व केवल पुरातात्विक रहस्य तक सीमित नहीं है। यह यात्रा के कठिन हिमालयी मार्ग का महत्वपूर्ण धार्मिक और भौगोलिक पड़ाव भी है।
इसके आगे ज्योरागली और शिलासमुद्र जैसे क्षेत्र यात्रा की कठिनाई को और बढ़ाते हैं।
होमकुंड में क्या होता है?
होमकुंड को नंदा देवी की यात्रा का प्रमुख अंतिम धार्मिक पड़ाव माना जाता है।
2026 की बड़ी जात में 20 सितंबर को होमकुंड पहुंचने का कार्यक्रम है। यहां मां नंदा की विशेष पूजा-अर्चना के बाद चौसिंग्या खाडू को कैलाश की दिशा में विदा करने की परंपरा निभाई जाएगी।
यही वह क्षण है जहां “मायके से ससुराल जा रही बेटी” की पूरी धार्मिक कल्पना अपने चरम पर पहुंचती है।
क्या Nanda Devi Yatra सिर्फ धार्मिक यात्रा है?
नहीं। इसे तीन स्तरों पर समझना ज्यादा सही होगा:
धार्मिक रूप से: यह नंदा देवी की कैलाश यात्रा और विदाई है।
सांस्कृतिक रूप से: यह गढ़वाल-कुमाऊं की लोक परंपराओं, गीतों, वाद्ययंत्रों, डोलियों और सामुदायिक रीति-रिवाजों को जीवित रखती है।
सामाजिक रूप से: यह प्रवासी पहाड़ियों को अपने गांवों से दोबारा जोड़ती है और विभिन्न गांवों को सामूहिक आयोजन में जोड़ती है।
इसी वजह से नंदा देवी राजजात को केवल “तीर्थ यात्रा” कहना इसके व्यापक सांस्कृतिक महत्व को कम करके आंकना होगा।
2026 की Nanda Devi Yatra इतनी खास क्यों है?
2026 का वर्ष इसलिए विशेष है क्योंकि नंदा परंपरा के दो अलग आयोजन सामने आए हैं।
एक तरफ नौटी से पारंपरिक मुख्य राजजात 2027 के लिए स्थगित हुई है। दूसरी ओर कुरुड़ से बड़ी जात 5 सितंबर 2026 को शुरू हो चुकी है।
इसका मतलब यह नहीं कि नंदा देवी की परंपरा रुक गई है। बल्कि 2026 में इसकी अलग-अलग क्षेत्रीय परंपराएं और धार्मिक अधिकार अपने-अपने स्वरूप में सामने आए हैं।
यही वजह है कि Nanda Devi Yatra 2026 को समझने के लिए “राजजात”, “बड़ी जात” और “लोकजात” के बीच अंतर समझना जरूरी है।
Source Use – उत्तराखंड में शुरू हुई मां नंदा देवी की बड़ी जात, कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हुई डोली
Nanda Devi Yatra की सबसे बड़ी पहचान क्या है?
इस यात्रा की सबसे बड़ी पहचान शायद इसका कोई एक मंदिर या एक पर्वत नहीं है।
इसकी असली पहचान है—एक बेटी की विदाई की कहानी को पूरे समाज द्वारा मिलकर जीना।
नंदा देवी यहां केवल देवी नहीं हैं। वह बेटी हैं, बहन हैं, घर की ध्याणी हैं और हिमालय की लोकआस्था का प्रतीक हैं।
कुरुड़ से उठने वाली डोली, ढोल-दमाऊं की आवाज, गांवों में लौटती धियाणियां, कठिन हिमालयी रास्ते, बेदनी बुग्याल, रूपकुंड, होमकुंड और अंत में चौसिंग्या खाडू की विदाई—ये सभी मिलकर नंदा देवी यात्रा को भारत की विशिष्ट जीवित सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल करते हैं।
2026 में यात्रा पर जाने वालों के लिए एक जरूरी बात
यह सामान्य पर्यटन ट्रेक नहीं है। यात्रा के ऊंचाई वाले हिस्सों में मौसम तेजी से बदल सकता है और रास्ते कठिन हो सकते हैं। इसलिए श्रद्धालुओं या यात्रियों को स्थानीय प्रशासन, आयोजन समिति और मौसम संबंधी आधिकारिक निर्देशों का पालन करना चाहिए।
साथ ही, धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए प्लास्टिक कचरा न फैलाना, स्थानीय जलस्रोतों को प्रदूषित न करना और संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी को नुकसान न पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।
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FAQ
Nanda Devi Yatra 2026 कब शुरू हुई?
2026 की नंदा देवी बड़ी जात 5 सितंबर 2026 को सिद्धपीठ कुरुड़ से शुरू हुई।
Nanda Devi Yatra 2026 कब होमकुंड पहुंचेगी?
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यात्रा 20 सितंबर 2026 को होमकुंड पहुंचेगी, जहां मुख्य पूजा और चौसिंग्या खाडू की विदाई होगी।
क्या 2026 में नंदा देवी राजजात हो रही है?
यहां अंतर जरूरी है। नौटी से होने वाली पारंपरिक मुख्य राजजात 2026 में स्थगित होकर 2027 के लिए तय की गई है, जबकि कुरुड़ से बड़ी जात 2026 में आयोजित हो रही है।
नंदा देवी राजजात कितने साल में होती है?
पारंपरिक नंदा देवी राजजात लगभग 12 वर्ष के अंतराल पर आयोजित होती है। चमोली जिला प्रशासन के अनुसार पिछली राजजात 2014 में हुई थी।
चौसिंग्या खाडू क्या है?
चौसिंग्या खाडू एक चार सींग वाला मेढ़ा है, जिसे नंदा देवी की राजजात/बड़ी जात में अत्यंत पवित्र प्रतीक माना जाता है। यात्रा में इसकी विशेष भूमिका होती है और होमकुंड पर इसे कैलाश की दिशा में विदा किया जाता है।
नंदा देवी को कैलाश क्यों भेजा जाता है?
लोकआस्था में नंदा देवी को हिमालय की बेटी माना जाता है। उनकी यात्रा मायके से ससुराल यानी भगवान शिव के कैलाश की ओर बेटी की विदाई का प्रतीक है।
Nanda Devi Yatra कहां होती है?
इसकी प्रमुख परंपराएं उत्तराखंड के चमोली, गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों से जुड़ी हैं। पारंपरिक राजजात का मुख्य मार्ग नौटी से होमकुंड तक माना जाता है, जबकि 2026 की बड़ी जात कुरुड़ से शुरू हुई है।
नंदा देवी यात्रा को हिमालयी महाकुंभ क्यों कहा जाता है?
बड़े पैमाने पर श्रद्धालुओं की भागीदारी, 12-वर्षीय धार्मिक चक्र, कठिन हिमालयी यात्रा, विभिन्न गांवों और देवी-देवताओं का मिलन तथा विशाल लोक-सांस्कृतिक स्वरूप के कारण इसे लोकप्रिय रूप से “हिमालयी महाकुंभ” कहा जाता है

