देहरादून: नंदा की चौकी पुल की एप्रोच रोड बारिश के बाद क्षतिग्रस्त होने के मामले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को मौके पर पहुंचकर पुनर्निर्माण कार्यों का निरीक्षण किया। उन्होंने निर्माण की गुणवत्ता, सुरक्षा इंतजाम और यातायात व्यवस्था की जानकारी अधिकारियों से ली।
प्रेमनगर क्षेत्र में स्थित यह पुल देहरादून को विकासनगर और आगे के इलाकों से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्ग पर है। ऐसे में एप्रोच रोड के क्षतिग्रस्त होने के बाद तत्काल यातायात बहाल करना प्रशासन के लिए प्राथमिकता बना था।
मुख्यमंत्री का यह निरीक्षण ऐसे समय हुआ है जब इस परियोजना को लेकर केवल तेज मरम्मत ही नहीं, बल्कि निर्माण गुणवत्ता और तकनीकी निगरानी से जुड़े सवाल भी उठे हैं।
कुछ ही दिनों में सामने आई बड़ी चुनौती
नंदा की चौकी में टौंस नदी पर बना नया पुल करीब ₹16 करोड़ की लागत से तैयार किया गया था और इसे 12 जुलाई 2026 को यातायात के लिए खोला गया था। यह पुल उस पुराने ढांचे की जगह बनाया गया था जो सितंबर 2025 की भारी बारिश और बाढ़ में बह गया था। उस आपदा में नंदा की चौकी के पास हुए हादसे में 14 लोगों की मौत हुई थी।
नए पुल के खुलने के महज कुछ सप्ताह बाद 28 जुलाई को तेज बारिश और बाढ़ के दौरान एप्रोच रोड का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। अधिकारियों के अनुसार, पुल का मुख्य ढांचा सुरक्षित रहा था और समस्या एप्रोच रोड के हिस्से में आई थी।
घटना के बाद लोक निर्माण विभाग, जिला प्रशासन और अन्य एजेंसियों ने मिलकर मरम्मत शुरू की। सरकार के अनुसार, करीब 12 घंटे के भीतर मार्ग पर यातायात बहाल कर दिया गया।
अब सवाल सिर्फ मरम्मत का नहीं, गुणवत्ता का भी
एप्रोच रोड के क्षतिग्रस्त होने के बाद प्रशासन ने तकनीकी जांच के निर्देश दिए थे। बाद की जांच में नदी के बहाव, कटाव और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर सवाल सामने आए।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, प्रारंभिक जांच में नदी के डायवर्जन और नदी तल के स्वरूप को ध्यान में रखते हुए जरूरी डिजाइन एवं तकनीकी आकलन में कमी की बात सामने आई। रिपोर्ट में कहा गया कि नदी का बहाव एक हिस्से की ओर केंद्रित होने से पुल के एबटमेंट के पास तेज कटाव हुआ, जिसके बाद एप्रोच रोड के नीचे खाली जगह बनी और सड़क क्षतिग्रस्त हुई।
इस मामले में PWD के एक कार्यकारी अभियंता को निलंबित किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक उन पर तकनीकी पर्यवेक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण और अनुबंध संबंधी शर्तों के पालन में लापरवाही के आरोप प्रारंभिक जांच में सामने आए।
इसके बाद तीन इंजीनियरों के खिलाफ कार्रवाई और निर्माण कंपनी को PWD के भविष्य के टेंडरों में भाग लेने से रोकने की भी रिपोर्ट सामने आई।
यह घटनाक्रम बताता है कि नंदा की चौकी की समस्या को अब केवल बारिश से हुई क्षति के रूप में नहीं देखा जा रहा है। परियोजना की तकनीकी योजना, निगरानी और निर्माण गुणवत्ता भी जांच के दायरे में है।
धामी ने अधिकारियों से मांगी काम की जानकारी
निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से पुनर्निर्माण कार्य की प्रगति और मौके पर किए जा रहे सुरक्षा उपायों की जानकारी ली। उन्होंने यह भी देखा कि यातायात संचालन को सुरक्षित बनाए रखने के लिए क्या व्यवस्थाएं की गई हैं।
बारिश के मौसम में इस मार्ग की अहमियत और बढ़ जाती है। देहरादून से विकासनगर तथा आगे हिमाचल प्रदेश की ओर जाने वाले यात्रियों के लिए यह मार्ग महत्वपूर्ण है। पुल या उसकी एप्रोच रोड में समस्या आने पर स्थानीय लोगों के साथ-साथ रोजाना यात्रा करने वाले कर्मचारियों, छात्रों और व्यापारियों को भी परेशानी होती है।
पिछले वर्ष पुल के बह जाने के बाद वैकल्पिक रास्तों के सहारे यातायात चलाया गया था। लंबे समय तक बनी इस परेशानी ने नए पुल के निर्माण को स्थानीय लोगों के लिए बड़ी उम्मीद बना दिया था।
2025 की आपदा ने पहले ही दिखा दी थी इस मार्ग की संवेदनशीलता
नंदा की चौकी पुल की मौजूदा कहानी को समझने के लिए सितंबर 2025 की आपदा को याद करना जरूरी है।
भारी बारिश के दौरान टौंस नदी में पानी बढ़ने से पुराना पुल क्षतिग्रस्त होकर बह गया था। इसके बाद देहरादून और विकासनगर के बीच संपर्क बुरी तरह प्रभावित हुआ। पुराने पुल के ढहने की घटना में 14 लोगों की जान गई थी।
इसके बाद करीब ₹16 करोड़ की लागत से नया पुल तैयार किया गया। निर्माण शुरू होने के बाद समयसीमा को लेकर भी सवाल उठे थे और परियोजना में देरी की रिपोर्ट सामने आई थी। जून 2026 में अधिकारियों ने इसे अंतिम चरण में बताया था।
यही वजह है कि नए पुल की एप्रोच रोड का बारिश में क्षतिग्रस्त होना सामान्य सड़क मरम्मत के मुकाबले ज्यादा गंभीर सवाल खड़े करता है।
आगे क्या देखना होगा?
नंदा की चौकी में यातायात बहाल करना तत्काल राहत है, लेकिन परियोजना की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पुनर्निर्माण के बाद एप्रोच रोड और पुल का पूरा सिस्टम मानसून के दबाव को कितना संभाल पाता है।
इसके लिए तीन बातें खास तौर पर महत्वपूर्ण रहेंगी तकनीकी जांच के निष्कर्षों पर कार्रवाई, नदी के कटाव और जलप्रवाह को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा उपाय तथा निर्माण गुणवत्ता की स्वतंत्र निगरानी।
जांच में जिन अधिकारियों और इंजीनियरों पर कार्रवाई की गई है, उससे जवाबदेही की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। लेकिन अंतिम तस्वीर तभी स्पष्ट होगी जब तकनीकी खामियों की वजह, जिम्मेदारी और भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए किए गए स्थायी उपाय सार्वजनिक रूप से सामने आएंगे।
नंदा की चौकी का मामला उत्तराखंड के लिए एक बड़ी चुनौती की ओर भी इशारा करता है। पहाड़ी और नदी घाटी वाले क्षेत्रों में सड़क और पुल परियोजनाओं को केवल निर्माण पूरा करने के आधार पर सफल नहीं माना जा सकता। उन्हें बदलते मौसम, तेज जलप्रवाह और भूस्खलन जैसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए तकनीकी रूप से मजबूत बनाना भी उतना ही जरूरी है।
मुख्यमंत्री का निरीक्षण इसी बड़े सवाल के बीच हुआ है क्या तेज मरम्मत के साथ ऐसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की गुणवत्ता और दीर्घकालिक सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा रही है?
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