Oh My Dog Review – ओह माय डॉग’ एक भावुक फिल्म है। जो इंसान और उसके वफादार कुत्ते के रिश्ते पर केंद्रित है। हालांकि इसकी पटकथा थोड़ी लंबी और सुस्त है, फिर भी चार पैरों वाले नायक, ऑस्कर का अभिनय, दमदार संदेश और मासूमियत दर्शकों का दिल जीत लेते हैं। फिल्म में नायक एक बेजुबान जीव है, जो मुख्यधारा की भारतीय सिनेमा के लिए एक अनूठा अनुभव प्रस्तुत करता है। निर्देशक अमित राय, जिन्होंने ‘ओएमजी 2’ जैसी संवेदनशील फिल्म बनाई है, इस बार ‘ओह माय डॉग’ पेश करते हैं।
यह फिल्म सिर्फ एक कुत्ते और उसके मालिक के प्यार की कहानी नहीं है, बल्कि यह बेज़ुबानों के प्रति मानवता की क्रूरता, सामाजिक असमानता, बाल श्रम और अंग तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों को भी उठाती है। बच्चों और जानवरों को केंद्र में रखकर फिल्म बनाना हमेशा जोखिम भरा होता है, फिर भी ‘ओह माय डॉग’ अपनी मासूमियत और भावनात्मक गहराई के साथ दर्शकों को एक ऐसी यात्रा पर ले जाती है जहां आँखे नम होती हैं और चेहरे पर मुस्कान आती है।
मोमो और ऑस्कर की तलाश: इंसान और वफादारी के बीच दो अनोखी खोज यात्राएं
फिल्म की शुरुआत एक भावुक दृश्य से होती है, जिसमें डिब्रूगढ़ के पुलिस बल द्वारा उनकी खोजी कुतिया सेनापति को अंतिम विदाई दी जाती है। उसकी मृत्यु के साथ ही उसके छोटे बच्चों को उसकी मां से अलग करने का मलाल भी झलकता है। कहानी दो दिशाओं में मुड़ती है: मोमो, जो डिब्रूगढ़ में एक मध्यमवर्गीय परिवार में रहता है, और ऑस्कर, जो पटना में एक बाल श्रमिक प्रिंस के साथ है।
जब मोमो अचानक गायब हो जाता है, तो इसके पीछे एक कुत्ते के मांस की तस्करी का गिरोह होता है। इसी समय, ऑस्कर का मालिक प्रिंस अवैध अंग तस्करी के नेटवर्क में लापता हो जाता है। फिल्म में दो समानांतर कहानियाँ चलती हैं: एक बच्चा अपने पालतू कुत्ते की खोज में भटकता है, जबकि एक कुत्ता अपने मालिक को खोजने में लगा रहता है।
अपू, मोमो की खोज में निकलता है, पुलिस की बेरुखी के बावजूद, अपने दिमाग और तकनीक से। उसे अपनी ट्यूशन टीचर कृष्णा का सहयोग मिलता है। दूसरी ओर, ऑस्कर प्रिंस के गायब होने पर उसके समर्थन में खड़ा होता है, निर्माण स्थल पर भौंक कर लोगों को जगाता है और गांव के मास्टर साहब की मदद से सुराग खोजता है। ये खोज यात्राएं कई सामाजिक वास्तविकताओं का सामना करती हैं।

Oh My Dog की कहानी में क्या है खास?
फिल्म की सबसे बड़ी strength इसका emotional core है। कहानी सिर्फ एक बच्चे और उसके पालतू कुत्ते की तलाश नहीं दिखाती, बल्कि दोनों तरफ से चल रही attachment को सामने रखती है। एक तरफ अपू अपने मोमो के लिए संघर्ष करता है, तो दूसरी ओर ऑस्कर अपने मालिक प्रिंस को खोजने के लिए लगातार प्रयास करता है।
फिल्म के Key Points
- इंसान और कुत्ते के रिश्ते पर focus।
- दो parallel search stories।
- Animal trafficking का मुद्दा।
- Child Labour और अंग तस्करी जैसे विषय।
- Emotional और social message का combination।
अपू और Oscar की Journey में फर्क
फिल्म दोनों characters की तलाश को parallel तरीके से आगे बढ़ाती है। दोनों का उद्देश्य अपने सबसे करीबी साथी तक पहुंचना है, लेकिन उनके रास्ते और परिस्थितियां अलग हैं।
| पहलू | अपू | ऑस्कर |
|---|---|---|
| तलाश | मोमो की | प्रिंस की |
| भूमिका | बच्चे की | वफादार कुत्ते की |
| तरीका | Technology और intelligence | Instinct और loyalty |
| मदद | कृष्णा | मास्टर साहब |
| मुख्य भावना | प्यार और लगाव | वफादारी और अपनापन |
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FAQs
Q1. Oh My Dog फिल्म किस बारे में है?
यह फिल्म इंसान और कुत्ते के रिश्ते के साथ animal cruelty, child labour और illegal trafficking जैसे मुद्दों को दिखाती है।
Q2. फिल्म का मुख्य आकर्षण क्या है?
फिल्म का मुख्य आकर्षण ऑस्कर का character और उसकी अपने मालिक प्रिंस के प्रति वफादारी है।
Q3. क्या फिल्म में दो parallel stories हैं?
हां, एक कहानी अपू और मोमो की तलाश पर है, जबकि दूसरी ऑस्कर और प्रिंस की खोज को दिखाती है।
Q4. फिल्म में कौन-कौन से social issues उठाए गए हैं?
Animal cruelty, dog meat trafficking, child labour, social inequality और illegal organ trafficking जैसे मुद्दे शामिल हैं।
Q5. क्या Oh My Dog family audience के लिए है?
फिल्म में emotional और sensitive themes हैं। इसलिए इसे देखने से पहले दर्शक अपनी पसंद और बच्चों की उम्र के अनुसार निर्णय ले सकते हैं।

