Chhath puja 2025 : छठ पूजा, भारत का एक प्राचीन और पवित्र पर्व, सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का अनूठा उत्सव है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, जिसे सूर्य षष्ठी व्रत भी कहा जाता है। वैदिक काल से चली आ रही इस परंपरा में सूर्य, जल और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में यह पर्व सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
अनुष्ठानों का अनूठा महत्व
डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य : छठ पूजा की सबसे खास विशेषता है डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देना। डूबता सूर्य जीवन चक्र के अंत और नई शुरुआत का प्रतीक है, जबकि उगता सूर्य नई ऊर्जा और आशा का। यह अनुष्ठान प्रकृति के चक्रीय स्वरूप को दर्शाता है।
कठोर व्रत और शुद्धता : छठ का 36 घंटे का निर्जला व्रत अनुशासन और आत्म-संयम का प्रतीक है। व्रती, विशेषकर महिलाएं, इसे संतान की मंगल कामना और परिवार के कल्याण के लिए रखती हैं। घाटों पर बांस की टोकरी में फल, ठेकुआ और अन्य प्रसाद चढ़ाए जाते हैं।
सामुदायिक एकता : छठ पूजा में समुदाय की भागीदारी इसे और विशेष बनाती है। लोग नदियों और तालाबों के घाटों पर एकत्र होते हैं, जो सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करता है। X पर #ChhathPuja2025 ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग घाटों की तस्वीरें और अनुभव साझा कर रहे हैं।
छठ पूजा को लेकर पौराणिक कथाएं
राजा प्रियवंद और छठी मैया : पौराणिक कथा के अनुसार, राजा प्रियवंद नि:संतान थे। महर्षि कश्यप के पुत्रेष्टि यज्ञ से रानी मालिनी को पुत्र प्राप्त हुआ, लेकिन वह मृत पैदा हुआ। दुखी राजा के सामने ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना (षष्ठी) प्रकट हुईं। उन्होंने राजा को छठी मैया की पूजा करने को कहा। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को व्रत करने से राजा को पुत्र प्राप्त हुआ। यह कथा छठ पूजा की शुरुआत को दर्शाती है।
दानवीर कर्ण और सूर्य पूजा : महाभारत के कर्ण, जो सूर्य के पुत्र थे, प्रतिदिन नदी में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते थे। यह परंपरा छठ पूजा की सूर्य उपासना से जुड़ी मानी जाती है।
द्रौपदी और पांडवों का व्रत : महाभारत में द्रौपदी ने पांडवों के स्वास्थ्य और खोए राजपाट की प्राप्ति के लिए छठ व्रत किया था। सूर्य उपासना के परिणामस्वरूप पांडवों को उनका राज्य वापस मिला। यह कथा छठ के चमत्कारिक प्रभाव को दर्शाती है।
श्रीराम और सीता की सूर्य उपासना : रामायण के अनुसार, रावण वध के बाद अयोध्या लौटने पर श्रीराम और सीता ने रामराज्य की स्थापना के लिए कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य उपासना की थी। यह छठ पूजा की पौराणिक नींव को मजबूत करता है।
कौन है छठ पूजा की छठी मैया?
षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानस पुत्री और सूर्य देव की बहन माना जाता है। मार्कण्डेय पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में इनका उल्लेख है। पूर्वी भारत में इन्हें छठी मैया के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी की पूजा भी इन्हीं से प्रेरित है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, षष्ठी देवी प्रकृति माता का छठा अंश हैं, जो सृष्टि के पोषण और संतान की रक्षा से जुड़ी हैं। छठ पूजा में सूर्य के साथ इनकी पूजा संतान की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए की जाती है।
आस्था और प्रकृति का संगम
छठ पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, सूर्य और छठी मैया के प्रति आभार का उत्सव है। वैदिक काल से चली आ रही यह परंपरा आज भी बिहार, झारखंड और अन्य क्षेत्रों में उसी उत्साह से मनाई जाती है। पौराणिक कथाएं, जैसे राजा प्रियवंद, श्रीराम, द्रौपदी और कर्ण की कहानियां, इस पर्व को ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गहराई से जोड़ती हैं। कठोर अनुष्ठान और सामुदायिक भागीदारी इसे अद्वितीय बनाते हैं। छठ पूजा 2025 में भी आस्था, शुद्धता और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक बनी रहेगी।


