Palm Oil Crisis: ईरान से जुड़े तनाव और वैश्विक हालात के चलते भारत में एक नया संकट खड़ा हो सकता है। यह पेट्रोल-डीज़ल नहीं, बल्कि पाम ऑयल से जुड़ा है। अगर सप्लाई प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर आम लोगों की रसोई और रोजमर्रा की चीज़ों पर पड़ सकता है।
भारत पाम ऑयल पर कितना निर्भर?
भारत हर साल करीब 95 लाख टन पाम ऑयल इस्तेमाल करता है, जबकि देश में इसका उत्पादन 4 लाख टन से भी कम है। यानी जरूरत का लगभग पूरा पाम ऑयल विदेशों से आता है। भारत मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से इसका आयात करता है।
रोजमर्रा की चीज़ों में कितना इस्तेमाल?
देश में इस्तेमाल होने वाले कुल खाने के तेल का लगभग 40% हिस्सा पाम ऑयल का होता है। इसकी सबसे बड़ी वजह इसका सस्ता होना और लंबे समय तक खराब न होना है। अनुमान है कि देश के करीब आधे घरों में खाना पाम ऑयल से बनता है या ऐसे तेल से जिसमें पाम ऑयल मिला होता है।
बाजार में मिलने वाले चिप्स, नमकीन, भुजिया, समोसे, फ्रेंच फ्राइज़ और डोनट जैसी चीज़ों में बड़े पैमाने पर पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा बिस्किट, केक, पेस्ट्री, कुकीज़, इंस्टेंट नूडल्स, चॉकलेट, आइसक्रीम और रेडी-टू-ईट फूड में भी इसका खूब उपयोग होता है। खाद्य उद्योग में कुल पाम ऑयल का 70% से ज्यादा हिस्सा खप जाता है।
होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे और स्ट्रीट फूड विक्रेता भी बड़े पैमाने पर पाम ऑयल का इस्तेमाल करते हैं। त्योहारों के समय इसकी मांग और बढ़ जाती है। खाने के अलावा पाम ऑयल का इस्तेमाल साबुन, शैम्पू, बॉडी वॉश, क्रीम, लोशन, लिपस्टिक, टूथपेस्ट और डिटर्जेंट जैसे उत्पादों में भी होता है। यहां तक कि पेंट बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है। यानी पाम ऑयल हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है।
सस्ता होने की वजह से ज्यादा इस्तेमाल
पाम ऑयल के ज्यादा इस्तेमाल की सबसे बड़ी वजह इसकी कीमत है। यह अन्य खाद्य तेलों के मुकाबले सस्ता होता है। जहां पाम ऑयल करीब 125 रुपये प्रति लीटर मिलता है, वहीं अन्य तेल 150 से 175 रुपये प्रति लीटर तक हो सकते हैं (कीमतें समय-समय पर बदलती रहती हैं)।
संकट का असर क्या होगा?
अगर अंतरराष्ट्रीय हालात के कारण पाम ऑयल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो भारत में इसकी कीमत बढ़ सकती है। इसका असर खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा की कई चीजों पर पड़ सकता है।
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