Period Leave: भारत में कामकाजी महिलाओं के लिए ‘पीरियड लीव’ का मुद्दा वर्तमान में काफी चर्चा में है। पीरियड्स के दौरान होने वाली शारीरिक और मानसिक तकलीफों को देखते हुए देश में एक समान राष्ट्रीय नीति की मांग लगातार उठ रही है। हालांकि, अभी तक इसे लेकर कोई केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान रुख
सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने इसे कानून के रूप में अनिवार्य बनाने से इनकार कर दिया है। कोर्ट का मानना है कि मासिक धर्म अवकाश को कानूनी रूप से सख्ती से लागू करने के विपरीत परिणाम हो सकते हैं। अदालत को डर है कि ऐसी नीति महिलाओं के करियर के लिए बाधा बन सकती है और निजी कंपनियां उन्हें नौकरी देने में हिचकिचा सकती हैं।
स्वास्थ्य और एंडोमेट्रियोसिस का खतरा
डॉक्टरों के अनुसार, पीरियड्स के दर्द को सामान्य मानकर सहना खतरनाक है। यह ‘एंडोमेट्रियोसिस’ जैसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है, जो भारत में तेजी से बढ़ रही है। हाल ही में एक मामला सामने आया जहाँ एक महिला की एंडोमेट्रियोसिस सिस्ट फटने से उन्हें आंतरिक ब्लीडिंग हुई। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अत्यधिक दर्द होने पर इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत जांच कराएं।
राज्यों और निजी कंपनियों की पहल
भले ही राष्ट्रीय कानून न हो, लेकिन कई राज्य और कंपनियां अपनी ओर से राहत दे रही हैं:
- बिहार: यहाँ 1992 से ही सरकारी महिला कर्मचारियों को हर महीने 2 दिन की छुट्टी मिल रही है।
- कर्नाटक: साल 2025 से सरकारी और प्राइवेट दोनों क्षेत्रों में 1 दिन की छुट्टी अनिवार्य कर दी गई है।
- केरल और ओडिशा: इन राज्यों में भी छात्राओं और महिला कर्मचारियों के लिए विशेष अवकाश और हाजिरी में छूट के नियम लागू हैं।
- प्राइवेट सेक्टर: जोमैटो, स्विगी और एलएंडटी जैसी बड़ी कंपनियां अपने स्तर पर पेड पीरियड लीव की सुविधा प्रदान कर रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी पक्षों से बात कर एक ऐसी संतुलित नीति तैयार करे, जिससे महिलाओं की सेहत और उनके रोजगार के अवसर दोनों सुरक्षित रहें।
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