Overthinking : क्या आपके साथ ऐसा होता है कि रात को सोने जाते समय दिमाग अचानक तेज़ी से दौड़ने लगता है? पुरानी बातें याद आने लगती हैं, छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी लगने लगती है और दिमाग बार-बार वही बातें सोचता रहता है। जैसे ‘मैंने ऐसा क्यों कहा?’, ‘अगर ऐसा हो गया तो?’, ‘लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे?’ अगर आपके मन में भी यही विचार चलते हैं, तो बता दें इसे ओवरथिंकिंग कहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि हमारा दिमाग ओवरथिंकिंग से बाहर क्यों नहीं निकल पाता और इसकी समस्या क्यों होती है? चलिए आज इसे विस्तार से समझते हैं।
ओवरथिंकिंग असल में क्या है?
साइकोलॉजी में इसे ‘रुमिनेशन’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि हमारा दिमाग पुरानी बुरी आदतों या समस्याओं को बार-बार सोचता रहता है। रिसर्च का कहना है कि दिमाग का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (यह वही हिस्सा है जो प्लानिंग और फैसले लेने में मदद करता है) ज़रूरत से ज़्यादा एक्टिव हो जाता है। लेकिन जब यह ‘ओवरड्राइव’ पर चला जाता है, तो हम समाधान नहीं ढूंढते, बल्कि बस समस्या को ‘रिप्ले’ करते रहते हैं।
ओवरथिंकिंग के मुख्य कारण
- भविष्य की चिंता – हम अक्सर उन घटनाओं के बारे में सोचकर परेशान होते हैं जो अभी तक हुई ही नहीं हैं। ‘अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा?’ या ‘अगर मैं फेल हो गया तो?’ जैसे सवाल मन में डर पैदा करते हैं, जिससे ओवरथिंकिंग शुरू हो जाती है।
- अतीत की गलतियों का पछतावा – बीते हुए कल में जो कुछ गलत हुआ या जो बातें आपने कह दीं, उन्हें बार-बार याद करना। लोग अक्सर सोचते हैं कि ‘काश मैंने ऐसा न किया होता’ या ‘मैं इसे अलग तरीके से कह सकता था।’
- आत्मविश्वास की कमी – अपने फैसलों पर भरोसा न होना। जब व्यक्ति को लगता है कि वह सही निर्णय नहीं ले सकता, तो वह एक ही छोटे से फैसले (जैसे- क्या पहनना है या क्या बोलना है) को लेकर घंटों सोचता रहता है।
- दूसरों से तुलना करना-आजकल सोशल मीडिया और इंटरनेट के जरिए हम दूसरों से तुलना करने लगते हैं। जैसे उनकी लाइफ कितनी सही है, उनके पास कितनी गाड़ियाँ हैं, वे कितने अमीर हैं।
ओवरथिंकिंग से दिमाग बाहर क्यों नहीं निकल पाता?
जब हम किसी समस्या के बारे में बार-बार सोचते हैं, तो हमारे दिमाग को लगता है कि हम कुछ ‘Productive’ यानी काम का कर रहे हैं। इसे ‘Illusion of Productivity’ कहा जाता है। दिमाग को यह धोखा होता है कि सोचने से समाधान निकल रहा है, जबकि हम एक ही जगह गोल-गोल घूम रहे होते हैं। यही कारण है कि ओवरथिंकिंग एक ‘Habit Loop’ यानी एक ऐसी आदत बन जाती है जिसे तोड़ना मुश्किल हो जाता है।
दिमाग का एक सिस्टम है जिसे ‘Default Mode Network’ कहते हैं। यह तब सबसे ज्यादा एक्टिव होता है जब हम किसी खास काम पर फोकस नहीं कर रहे होते। इसीलिए जब हम रात में अकेले होते हैं या खाली बैठते हैं, तो दिमाग अपने आप पुरानी यादों और भविष्य की डरावनी संभावनाओं की ओर भागने लगता है। यही वजह है कि सुकून के समय भी दिमाग शांत नहीं रहता।

