उत्तराखंड में पहाड़ी यात्रा और पर्यटन की तस्वीर बदलने की कोशिश अब सिर्फ नई रोपवे परियोजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं है। सरकार अब इनके संचालन के लिए अलग नियम और नियामकीय व्यवस्था तैयार करने की दिशा में बढ़ रही है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने रोपवे से जुड़ी परियोजनाओं की समीक्षा के दौरान ब्रिडकुल को नियम और अधिनियम तैयार करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही केदारनाथ और हेमकुंड साहिब रोपवे परियोजनाओं में बेहतर तालमेल के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे।
बुधवार की समीक्षा बैठक में सरकार का फोकस सिर्फ निर्माण की गति पर नहीं रहा। जमीन से जुड़े लंबित मामलों, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय, परियोजनाओं की डीपीआर और मंजूरी जैसी प्रक्रियाओं को तेजी से पूरा करने पर भी जोर दिया गया। इसका मतलब साफ है कि राज्य सरकार रोपवे को पहाड़ी कनेक्टिविटी और पर्यटन के लिए बड़े परिवहन ढांचे के रूप में आगे बढ़ाना चाहती है।
रोपवे के लिए अलग नियम क्यों जरूरी हो रहे हैं?
उत्तराखंड में रोपवे परियोजनाओं की संख्या बढ़ने के साथ उनके संचालन, सुरक्षा, जिम्मेदारियों और यात्रियों की सुविधाओं से जुड़े नियमों की जरूरत भी बढ़ती है। फिलहाल राज्य के परिवहन विभाग की सार्वजनिक नियमावली सूची में मोटर वाहन और अन्य परिवहन संबंधी नियम उपलब्ध हैं, लेकिन रोपवे संचालन के लिए अलग राज्य स्तरीय नियमावली का उल्लेख वहां नहीं मिलता।
नई व्यवस्था बनने पर यह स्पष्ट किया जाना महत्वपूर्ण होगा कि रोपवे के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होगी, सुरक्षा मानकों की निगरानी कैसे होगी और किसी आपात स्थिति में यात्रियों को निकालने की व्यवस्था किस तरह काम करेगी। हालांकि, सरकार ने प्रस्तावित नियमों की विस्तृत रूपरेखा अभी सार्वजनिक नहीं की है।
केदारनाथ और हेमकुंड साहिब पर विशेष निगरानी
धार्मिक पर्यटन के लिहाज से केदारनाथ और हेमकुंड साहिब दोनों महत्वपूर्ण गंतव्य हैं। उत्तराखंड के आधिकारिक पर्यटन पोर्टल पर चारधाम और हेमकुंड साहिब यात्रा के लिए पंजीकरण व्यवस्था संचालित होती है।
इन क्षेत्रों में रोपवे परियोजनाओं की प्रगति का सीधा असर यात्रियों की पहुंच, यात्रा के समय और मौजूदा परिवहन व्यवस्था पर पड़ सकता है। इसी कारण सरकार ने इन परियोजनाओं के बीच समन्वय के लिए नोडल अधिकारियों की व्यवस्था करने का फैसला किया है।
हालांकि, किसी रोपवे को मंजूरी मिलना और उसका वास्तविक संचालन शुरू होना अलग-अलग चरण हैं। भूमि, पर्यावरण, तकनीकी स्वीकृति, निर्माण और सुरक्षा से जुड़े परीक्षण जैसी प्रक्रियाएं परियोजना की समयसीमा तय करने में अहम होंगी।
नैनीताल की दो परियोजनाओं पर भी जोर
समीक्षा में नैनीताल क्षेत्र की दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं—रानीबाग-ज्योलीकोट-हनुमानगढ़ी-कैंचीधाम और रानीबाग-भीमताल-भवाली—पर भी चर्चा हुई।
मुख्य सचिव ने नेशनल हाईवेज लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट लिमिटेड (NHLML) और उत्तराखंड मेट्रो रेल, अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर एंड बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UKMRC) के बीच बेहतर तालमेल के निर्देश दिए। UKMRC से संबंधित फाइनल अप्रूवल, फाइनल डीपीआर और डीएफसी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।
इन परियोजनाओं में एक और महत्वपूर्ण पहलू पार्किंग है। मुख्य सचिव ने सभी रोपवे परियोजनाओं में पार्किंग सुविधा को अनिवार्य रूप से शामिल करने को कहा है। इसका कारण व्यावहारिक है—अगर रोपवे स्टेशन तक पहुंचने वाले वाहनों के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं हुई, तो सड़क पर भीड़ कम करने के बजाय नए ट्रैफिक दबाव की समस्या पैदा हो सकती है।
सिर्फ बड़े तीर्थ नहीं, पर्यटन सर्किट भी निशाने पर
सरकार की सूची में धार्मिक स्थलों के अलावा पर्यटन केंद्रों को जोड़ने वाली परियोजनाएं भी हैं। पर्यटन विभाग की जोशीमठ-औली-गोरसों, रैथल-बारसू और पुरकुल-मसूरी रोपवे परियोजनाओं की समीक्षा की गई। इसके अलावा यमुनोत्री-जानकी चट्टी, हनुमानचट्टी-पूर्णागिरि और तपोवन-कुंजपुरा परियोजनाओं की भी जानकारी ली गई।
उत्तराखंड में रोपवे को केवल यातायात के वैकल्पिक साधन के रूप में देखना अधूरा होगा। राज्य के कई पर्यटन और तीर्थ क्षेत्र ऐसे हैं जहां सड़क से पहुंचने में समय और मौसम दोनों बड़ी भूमिका निभाते हैं। रोपवे इन स्थानों तक पहुंच आसान कर सकते हैं, लेकिन उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे स्थानीय परिवहन, पार्किंग और मौजूदा यातायात व्यवस्था के साथ कितनी अच्छी तरह जोड़े जाते हैं।
हरिद्वार में हर की पौड़ी से चंडी देवी मंदिर तक प्रस्तावित यात्री रोपवे के पर्यावरणीय अध्ययन में भी बेहतर पहुंच, समय की बचत और स्थानीय रोजगार जैसे संभावित लाभों का उल्लेख किया गया है।
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अब नजर नियम, जमीन और मंजूरियों पर
सरकार की ताजा समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि उत्तराखंड में रोपवे विस्तार का अगला चरण प्रशासनिक अड़चनों को हटाने पर केंद्रित होगा। भूमि संबंधी मामले और विभागों के बीच समन्वय लंबे समय तक लंबित रहे तो परियोजनाओं की लागत और समय दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए आने वाले समय में तीन चीजें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहेंगी—रोपवे संचालन के लिए प्रस्तावित नियम कब तैयार होते हैं, लंबित भूमि और मंजूरी संबंधी मामले कितनी तेजी से निपटते हैं और जिन परियोजनाओं की डीपीआर प्रक्रिया चल रही है, उन्हें अंतिम स्वीकृति कब मिलती है।
अभी सरकार ने परियोजनाओं को गति देने के निर्देश दिए हैं; किसी भी परियोजना के शुरू होने की निश्चित तारीख इस समीक्षा से तय नहीं होती। असली बदलाव तब दिखाई देगा जब नियामकीय ढांचा तैयार होने के साथ परियोजनाएं निर्माण और उसके बाद सुरक्षित यात्री संचालन के चरण तक पहुंचेंगी।

