सिंध की धरती को मां बताते हुए पीपीपी की चुनौती और असीम मुनीर के साथ सिंध प्रांत के बंटवारे के विरोध को दर्शाती समाचार छवि।

‘सिंध की धरती हमारी मां, इसके लिए मर जाएंगे’, असीम मुनीर को PPP की चुनौती, प्रांत बंटा तो संभाल नहीं पाओगे

सिंध: पाकिस्तान में सिंध के बंटवारे को लेकर राजनीतिक तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। सिंध विधानसभा ने प्रांत को विभाजित करने या उसके भीतर नए प्रांत/प्रशासनिक इकाइयां बनाने के प्रस्तावों को खारिज करते हुए प्रस्ताव पारित किया है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के लिए यह मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक पुनर्गठन का नहीं, बल्कि सिंध की राजनीतिक और भौगोलिक पहचान का सवाल बन गया है।

मुझे इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगती है कि बहस अब सिर्फ ‘नया प्रांत बनना चाहिए या नहीं’ तक सीमित नहीं रही। इसके केंद्र में सिंध की क्षेत्रीय एकता, कराची की स्थिति और केंद्र बनाम प्रांतीय अधिकारों का सवाल भी आ गया है।

सिंध विधानसभा ने बंटवारे के खिलाफ क्या फैसला लिया?

3 सितंबर 2026 को सिंध विधानसभा ने नए प्रांतों और प्रशासनिक इकाइयों के गठन के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव PPP नेता निसार अहमद खुहरो ने पेश किया था। इसमें सिंध को किसी भी तरह से विभाजित करने या उसके किसी हिस्से को अलग करने की योजना को अस्वीकार किया गया।

प्रस्ताव में कहा गया कि सिंध एक है और एक ही रहेगा। साथ ही प्रांत की भौगोलिक सीमाओं में बदलाव के लिए संवैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी बताया गया।

मेरे लिए यहां एक बात खास है—यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं रहा, बल्कि विधानसभा के रिकॉर्ड का हिस्सा बन गया है।

‘सिंध हमारी मां है’ क्यों बना बड़ा राजनीतिक संदेश?

PPP ने इस बहस को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर उठाया है। पार्टी नेताओं और विधायकों ने सिंध को अपनी मां और अपनी पहचान से जोड़ते हुए प्रांत के विभाजन का विरोध किया।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, PPP नेताओं ने सिंध की एकता को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया और कहा कि पार्टी किसी भी कीमत पर इसके विभाजन को स्वीकार नहीं करेगी।

ऐसे बयान को केवल राजनीतिक नारे के रूप में देखना आसान होगा, लेकिन सिंध की राजनीति में इसका गहरा अर्थ है। PPP लंबे समय से सिंध को अपनी सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन मानती रही है। इसलिए प्रांत की सीमाओं में संभावित बदलाव पार्टी के राजनीतिक आधार को भी प्रभावित कर सकता है।

क्या असीम मुनीर सच में सिंध को बांटने की योजना बना रहे हैं?

यहां थोड़ी सावधानी जरूरी है। असीम मुनीर की ओर से सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई स्पष्ट बयान नहीं मिला है जिसमें उन्होंने खुद सिंध को बांटने की योजना घोषित की हो।

हालांकि, पाकिस्तान में छोटे प्रांतों और नई प्रशासनिक इकाइयों को लेकर बहस तेज हुई है। कुछ राजनीतिक नेताओं और केंद्रीय स्तर के नेताओं ने बड़े प्रांतों को छोटे प्रशासनिक हिस्सों में बांटने की जरूरत पर चर्चा की है। इसी व्यापक बहस को सिंध के नेता अपने प्रांत के संभावित विभाजन से जोड़ रहे हैं।

इसी वजह से मीडिया और राजनीतिक विमर्श में सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर का नाम भी चर्चा में आ रहा है। लेकिन इसे सिद्ध योजना के बजाय वर्तमान राजनीतिक विवाद और आरोप-प्रत्यारोप के संदर्भ में देखना ज्यादा सही होगा।

मुराद अली शाह ने क्या कहा?

सिंध के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने साफ किया है कि सिंध की भौगोलिक एकता पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

विधानसभा में बहस के दौरान उन्होंने कहा कि सिंध के भविष्य का फैसला निर्वाचित प्रतिनिधियों को करना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक इकाइयां बनाने और किसी नए प्रांत के गठन में अंतर है।

मेरे नजरिए से यही इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। अगर सिर्फ प्रशासनिक सुविधा के लिए जिले या डिवीजन बनाए जाते हैं, तो मामला अलग है। लेकिन अगर उन्हें अलग विधानसभा और व्यापक प्रांतीय अधिकार दिए जाते हैं, तो वह नया राजनीतिक प्रांत बनाने की दिशा में कदम माना जा सकता है।

कराची को अलग करने की मांग से क्यों बढ़ा विवाद?

सिंध के बंटवारे की चर्चा में कराची सबसे संवेदनशील मुद्दा है। लंबे समय से कुछ राजनीतिक समूह कराची और शहरी सिंध के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था या नए प्रांत की मांग करते रहे हैं।

हालिया बहस में भी कराची को सिंध से अलग करने और दक्षिणी सिंध जैसे नए प्रांत की संभावनाओं का जिक्र हुआ है। PPP इसे सिंध की क्षेत्रीय एकता के लिए चुनौती मानती है।

दूसरी तरफ विपक्षी MQM-P और कुछ अन्य दलों ने यह तर्क दिया है कि प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और बेहतर शासन पर चर्चा को सीधे सिंध के विभाजन के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।

सिंध के बंटवारे का मुद्दा इतना संवेदनशील क्यों है?

सिंध पाकिस्तान के चार प्रमुख प्रांतों में से एक है और कराची इसकी राजधानी नहीं, बल्कि देश का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक शहर भी है। बंदरगाह, उद्योग, वित्तीय गतिविधियां और व्यापारिक नेटवर्क इसे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का अहम केंद्र बनाते हैं।

ऐसे में सिंध की सीमाओं में बदलाव सिर्फ नक्शे पर एक रेखा खींचने जैसा फैसला नहीं होगा। इससे प्रशासन, संसाधनों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पानी, राजस्व और सत्ता के बंटवारे पर भी असर पड़ सकता है।

इसी कारण PPP इस मुद्दे पर किसी भी जल्दबाजी के खिलाफ खड़ी दिखाई दे रही है।

क्या सिंध वास्तव में बंट सकता है?

कानूनी रूप से किसी प्रांत की सीमाओं में बदलाव आसान नहीं है। सिंध के मुख्यमंत्री ने भी संवैधानिक प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा है कि प्रांत के विभाजन के लिए संबंधित विधानसभा की आवश्यक संवैधानिक मंजूरी जरूरी होगी।

इसका मतलब यह है कि केवल राजनीतिक बयान या केंद्र सरकार की इच्छा से सिंध का नक्शा नहीं बदला जा सकता।

फिलहाल उपलब्ध घटनाक्रम को देखते हुए सिंध के तत्काल विभाजन की स्थिति नहीं दिखती। बल्कि अभी मुख्य कहानी राजनीतिक विरोध, संवैधानिक अधिकारों और प्रशासनिक पुनर्गठन की बहस की है।

आगे क्या होगा?

मेरी नजर में आने वाले दिनों में तीन बातें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहेंगी—केंद्र सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है, MQM-P और दूसरे दल प्रशासनिक इकाइयों की मांग को किस तरह आगे बढ़ाते हैं और PPP अपने राजनीतिक विरोध को कितनी मजबूती से जारी रखती है।

सिंध विधानसभा का प्रस्ताव फिलहाल PPP के रुख को स्पष्ट कर चुका है। अब गेंद संघीय सरकार और उन राजनीतिक ताकतों के पाले में है जो पाकिस्तान में छोटे प्रांतों या नई प्रशासनिक इकाइयों की वकालत कर रही हैं।

फिलहाल इतना साफ है कि सिंध के बंटवारे का मुद्दा पाकिस्तान की राजनीति में एक बड़ा संवेदनशील मोर्चा बन चुका है। PPP इसे अपनी राजनीतिक और क्षेत्रीय पहचान से जोड़ रही है, जबकि समर्थक इसे बेहतर प्रशासन के नजरिए से देख रहे हैं। आने वाले समय में यह बहस केवल सिंध तक सीमित रहेगी या पाकिस्तान के पूरे संघीय ढांचे को प्रभावित करेगी, इस पर सबकी नजर रहेगी।

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