मनोज जरांगे: महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रमुख चेहरे मनोज जरांगे पाटील का अनिश्चितकालीन अनशन नौवें दिन भी जारी रहा, लेकिन इस दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने की खबर ने समर्थकों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। जरांगे ने मेडिकल जांच, इलाज और पानी लेने से भी इनकार कर दिया है। डॉक्टरों की टीम उनकी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।
मेरी नजर में इस पूरे घटनाक्रम की गंभीरता सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ी है कि एक आंदोलनकारी की सेहत खराब हो रही है, बल्कि इसलिए भी कि इसके पीछे महाराष्ट्र की लंबे समय से चली आ रही मराठा आरक्षण और कुनबी प्रमाणपत्र की मांग जुड़ी हुई है। सरकार और जरांगे के बीच बातचीत के बावजूद फिलहाल कोई अंतिम समाधान सामने नहीं आया है।
नौवें दिन क्यों बिगड़ी मनोज जरांगे की तबीयत?
मनोज जरांगे ने 29 अगस्त 2026 को जालना जिले के अंतरवाली सराटी में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। यह आंदोलन मराठा समाज के लिए कुनबी प्रमाणपत्र और उससे जुड़े आरक्षण लाभों की मांग को लेकर है।
अनशन के शुरुआती दिनों में उनकी तबीयत को लेकर चिंता बढ़ने लगी थी। 2 सितंबर को सरकारी प्रतिनिधियों से बातचीत के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए पानी और सलाइन लेने पर सहमति जताई थी, लेकिन अनशन खत्म नहीं किया था। इसके बाद उन्होंने दोबारा पानी और चिकित्सा सहायता लेने से इनकार कर दिया।
नौवें दिन स्थिति और गंभीर हो गई। सरकारी मेडिकल टीम ने रात से सुबह के बीच दो बार उनकी जांच करने की कोशिश की, लेकिन जरांगे ने स्वास्थ्य जांच और IV फ्लूइड लेने से इनकार कर दिया। रिपोर्टों के मुताबिक डॉक्टर उनकी स्थिति पर लगातार नजर रखने की कोशिश कर रहे हैं।
मेरे लिए यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भूख हड़ताल के साथ पानी और चिकित्सा सहायता से इनकार करना स्वास्थ्य के लिहाज से कहीं अधिक गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है। इसलिए अब आंदोलन की राजनीतिक मांग के साथ-साथ जरांगे की सेहत भी इस पूरे विवाद का बड़ा मुद्दा बन गई है।
क्या है मनोज जरांगे की मुख्य मांग?
इस आंदोलन का केंद्र कुनबी जाति प्रमाणपत्र है। जरांगे की मांग है कि पात्र मराठा परिवारों को उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड के आधार पर कुनबी प्रमाणपत्र जारी किए जाएं, जिससे वे महाराष्ट्र में OBC श्रेणी के तहत मिलने वाले आरक्षण लाभों का दावा कर सकें।
जरांगे विशेष रूप से ऐतिहासिक दस्तावेजों और हैदराबाद गजट से जुड़े रिकॉर्ड के आधार पर प्रमाणपत्र जारी करने पर जोर दे रहे हैं। उन्होंने प्रमाणपत्र प्रक्रिया में तेजी लाने और पात्र लोगों को लाभ देने की मांग की है।
सरकार की ओर से भी इस दिशा में कार्रवाई का दावा किया गया है। महाराष्ट्र सरकार के मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटील के अनुसार, सरकार ने लगभग 58 लाख कुनबी रिकॉर्ड खोजे हैं और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया तेज करने की बात कही है। हालांकि, जरांगे सरकार के आश्वासन से संतुष्ट नहीं हैं और उनका कहना है कि जमीनी स्तर पर मांग के अनुरूप कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए।
सरकार और जरांगे के बीच बातचीत से क्यों नहीं निकला रास्ता?
सरकार के प्रतिनिधियों ने आंदोलन स्थल पर पहुंचकर जरांगे से बातचीत की है। सरकार की तरफ से उन्हें अनशन समाप्त करने की अपील भी की गई है। लेकिन जरांगे तत्काल ठोस निर्णय चाहते हैं।
यही वजह है कि बातचीत के बावजूद आंदोलन खत्म नहीं हुआ। रिपोर्टों के अनुसार जरांगे ने सरकार को 11 सितंबर तक अपनी मांगों पर कार्रवाई करने की समयसीमा दी है और इसके बाद मुंबई की ओर मार्च की चेतावनी दी है। कुछ रिपोर्टों में 12 सितंबर को मुंबई कूच की बात सामने आई है।
मेरी समझ में यही वह बिंदु है जहां यह आंदोलन केवल अंतरवाली सराटी तक सीमित नहीं रह जाता। अगर समयसीमा तक कोई समझौता नहीं होता, तो मुंबई में बड़ा जमावड़ा महाराष्ट्र सरकार के सामने नई राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती पैदा कर सकता है।
OBC समुदाय की चिंता भी बढ़ी
मराठा आरक्षण की मांग का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष OBC समुदाय की प्रतिक्रिया है। कुनबी समुदाय महाराष्ट्र की OBC व्यवस्था का हिस्सा है। यदि बड़ी संख्या में मराठा लोगों को कुनबी प्रमाणपत्र मिलते हैं, तो वे मौजूदा OBC आरक्षण के लाभ के लिए पात्र हो सकते हैं।
इसी वजह से OBC संगठनों के एक हिस्से में यह चिंता है कि उनके मौजूदा आरक्षण लाभों पर दबाव बढ़ सकता है। हाल की रिपोर्टों में मराठा और OBC समुदायों के बीच तनाव बढ़ने की आशंका भी सामने आई है।
मेरे विचार से सरकार के सामने सबसे कठिन चुनौती यही है—मराठा समाज की मांग को संबोधित करना और साथ ही OBC समुदाय को यह भरोसा दिलाना कि उसके मौजूदा अधिकारों से समझौता नहीं होगा।
मराठा आरक्षण का कानूनी पेंच क्या है?
मराठा आरक्षण का विवाद नया नहीं है। महाराष्ट्र सरकार ने 2018 में मराठा समुदाय को आरक्षण देने का कानून बनाया था, लेकिन मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आरक्षण को रद्द कर दिया। अदालत ने 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा और असाधारण परिस्थितियों से जुड़े संवैधानिक मानकों पर भी विचार किया था।
इसके बाद महाराष्ट्र ने 2024 में मराठा समुदाय के लिए अलग से 10 प्रतिशत SEBC आरक्षण का कानून बनाया। इस कानून को भी अदालत में चुनौती दी गई है।
यानी मौजूदा विवाद केवल राजनीतिक फैसला लेने से खत्म नहीं होगा। किसी भी नई व्यवस्था को संवैधानिक और कानूनी कसौटियों पर भी खरा उतरना होगा।
अब आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं। पहली, मनोज जरांगे की स्वास्थ्य स्थिति। दूसरी, सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत। तीसरी, 11 सितंबर की समयसीमा के बाद प्रस्तावित मुंबई मार्च।
अगर जरांगे पानी और इलाज लेने से लगातार इनकार करते हैं, तो उनकी स्वास्थ्य स्थिति आंदोलन का सबसे संवेदनशील पहलू बन सकती है। दूसरी ओर, यदि सरकार कुनबी प्रमाणपत्रों को लेकर कोई स्पष्ट और स्वीकार्य रोडमैप देती है, तो बातचीत के जरिए रास्ता निकलने की संभावना बनी रह सकती है।
लेकिन अगर दोनों पक्ष अपनी स्थिति पर कायम रहते हैं, तो आंदोलन महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकता है। पहले ही कई इलाकों में बंद, सड़क जाम और विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं।
Source to be used: Jagran
निष्कर्ष
मेरी नजर में मनोज जरांगे का नौवें दिन पानी और इलाज से इनकार करना इस आंदोलन का अब तक का सबसे गंभीर चरण है। यह सिर्फ आरक्षण की मांग का सवाल नहीं रह गया है; इसके साथ स्वास्थ्य, कानून, OBC अधिकार और महाराष्ट्र की सामाजिक-राजनीतिक स्थिरता भी जुड़ गई है।
सरकार के पास बातचीत का रास्ता अभी खुला है, लेकिन समय तेजी से निकल रहा है। एक तरफ जरांगे अपनी मांगों पर पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे, दूसरी तरफ सरकार को ऐसा समाधान खोजना होगा जो मराठा समाज की अपेक्षाओं, OBC समुदाय की चिंताओं और संवैधानिक सीमाओं—तीनों के बीच संतुलन बना सके।

