दिल्ली के कथित शराब नीति मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने गुरुवार, 13 अगस्त 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। दोनों नेताओं ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की उस रिवीजन याचिका को खारिज करने की मांग की है, जिसके जरिए जांच एजेंसी ने उन्हें डिस्चार्ज किए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है।
केजरीवाल और सिसोदिया ने हाई कोर्ट में दाखिल अपनी अर्जियों में CBI की याचिका की मेंटेनेबिलिटी पर प्रारंभिक आपत्ति जताई है। मामला दिल्ली हाई कोर्ट की एकल पीठ के समक्ष लंबित है। उनका तर्क है कि CBI की रिवीजन याचिका कानून में तय सीमाओं और सुप्रीम कोर्ट तथा विभिन्न हाई कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
CBI की याचिका पर क्या है आपत्ति?
दोनों नेताओं का मुख्य तर्क है कि ट्रायल कोर्ट के 27 फरवरी के फैसले के सार्वजनिक होने के करीब चार घंटे के भीतर ही CBI ने हाई कोर्ट में रिवीजन याचिका दाखिल कर दी थी। केजरीवाल और सिसोदिया ने इसे “अभूतपूर्व जल्दबाजी” बताते हुए कहा है कि इतने कम समय में 500 से अधिक पन्नों वाले फैसले में दर्ज निष्कर्षों का पर्याप्त मूल्यांकन संभव नहीं था।
उनकी अर्जियों के अनुसार, CBI की याचिका एक व्यापक या “ओम्निबस” याचिका है, जिसमें यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला किस बिंदु पर गलत था या किस आरोपी के संबंध में महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज किया गया। दोनों नेताओं का कहना है कि CBI ने ऐसा कोई नया सबूत, दस्तावेज या सामग्री भी पेश नहीं की है जिससे डिस्चार्ज आदेश को मनमाना, अवैध या त्रुटिपूर्ण साबित किया जा सके।
इसी आधार पर बचाव पक्ष ने कहा है कि CBI की याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि ऐसी अस्पष्ट याचिका पर सुनवाई आगे बढ़ती है तो उन्हें यह समझने में कठिनाई होगी कि उन्हें किन विशिष्ट आरोपों या कानूनी आधारों का जवाब देना है।
रिवीजन और अपील में क्या अंतर है?
इस मामले में कानूनी विवाद का एक अहम पहलू हाई कोर्ट की रिवीजनल जूरिस्डिक्शन है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, रिवीजन के दौरान हाई कोर्ट का हस्तक्षेप अपील की तुलना में सीमित होता है और मुख्य रूप से यह देखा जाता है कि निचली अदालत का फैसला कानूनी या प्रक्रियात्मक रूप से गलत तो नहीं था।
केजरीवाल और सिसोदिया इसी सीमित दायरे को आधार बनाकर CBI की चुनौती पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जांच एजेंसी का मकसद पहले से जांचे जा चुके सबूतों को दोबारा पेश करना है, जबकि रिवीजन की कार्यवाही में सबूतों का नए सिरे से मूल्यांकन सीमित परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
27 फरवरी को क्या हुआ था?
27 फरवरी 2026 को राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने कथित दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े CBI भ्रष्टाचार मामले में केजरीवाल, सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया था। अदालत ने CBI की जांच में कई खामियों पर सवाल उठाए थे।
यहां “डिस्चार्ज” और “बरी” के बीच अंतर समझना जरूरी है। डिस्चार्ज का अर्थ है कि अदालत ने आरोप तय कर मुकदमा आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक प्रारंभिक आधार नहीं पाया। यह किसी ट्रायल के बाद दिया जाने वाला दोषमुक्ति का फैसला नहीं है।
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ CBI ने उसी दिन दिल्ली हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दाखिल की। बाद में हाई कोर्ट में इस चुनौती पर नोटिस भी जारी हुआ। मामले का शीर्षक CBI v. Kuldeep Singh & Ors. है।
CBI का पक्ष क्यों महत्वपूर्ण है?
CBI ने ट्रायल कोर्ट के डिस्चार्ज आदेश को चुनौती देते हुए यह रुख अपनाया है कि मामले में उपलब्ध सामग्री और जांच के कुछ पहलुओं को अदालत ने पर्याप्त रूप से नहीं देखा। इसलिए हाई कोर्ट के सामने अब मूल सवाल यह है कि क्या ट्रायल कोर्ट का डिस्चार्ज आदेश कानूनी रूप से सही था और क्या CBI की रिवीजन याचिका उस आदेश में हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत करती है।
इस स्तर पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि केजरीवाल और सिसोदिया के खिलाफ मामला पूरी तरह समाप्त हो गया है। ट्रायल कोर्ट का डिस्चार्ज आदेश उनके पक्ष में है, लेकिन CBI की चुनौती के कारण इस मामले की कानूनी लड़ाई हाई कोर्ट में जारी है।
13 अगस्त को दाखिल नई अर्जियों पर अब दिल्ली हाई कोर्ट को यह तय करना होगा कि CBI की चुनौती को मौजूदा रूप में सुनवाई योग्य माना जाए या नहीं। आगे की कार्यवाही इस बात पर निर्भर करेगी कि अदालत इन प्रारंभिक आपत्तियों और CBI की रिवीजन याचिका पर क्या रुख अपनाती है।
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