राम मंदिर ट्रस्ट के CEO चयन में धार्मिक आचरण पर सवाल और 5,200 आवेदकों में से 18 उम्मीदवारों का इंटरव्यू

राम मंदिर ट्रस्ट के CEO चयन में धार्मिक आचरण पर सवाल, 5,200 आवेदकों में से 18 उम्मीदवार इंटरव्यू में

अयोध्या में राम मंदिर के प्रशासन को अधिक पेशेवर ढांचे में लाने की कोशिश के बीच श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पहले पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के चयन की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच गई है। 5,200 से अधिक आवेदनों में से 18 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए चुना गया है। इनमें पूर्व IAS और IPS अधिकारियों के साथ-साथ पूर्व सैन्य अधिकारी और दक्षिण भारत के कुछ प्रमुख मंदिरों के प्रशासन से जुड़े लोग शामिल हैं।

लेकिन इस चयन प्रक्रिया ने प्रशासनिक क्षमता के साथ-साथ उम्मीदवारों की निजी धार्मिक जीवनशैली को लेकर पूछे जा रहे सवालों के कारण भी ध्यान खींचा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उम्मीदवारों से भगवान राम में उनकी आस्था, जनेऊ धारण करने, शिखा रखने, शाकाहारी या मांसाहारी होने और शराब का सेवन करने जैसे सवाल पूछे गए। साथ ही उनसे भीड़ प्रबंधन, नेतृत्व क्षमता और मंदिर के भविष्य के लिए उनकी कार्ययोजना पर भी सवाल किए गए।

18 उम्मीदवारों के बीच चयन, तीन नामों की होगी सिफारिश

CEO पद के लिए इंटरव्यू 11 और 12 अगस्त को अयोध्या में किए जाने की जानकारी सामने आई है। चयन समिति तीन नामों की सिफारिश करेगी, जिनमें से अंतिम उम्मीदवार का चयन ट्रस्ट करेगा। समिति में सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस प्रमोद कोहली, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल विष्णुकांत चतुर्वेदी और साईं बाबा संस्थान से जुड़े रहे सुरेश हावरे शामिल हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, कुछ उम्मीदवारों से 40 से 50 मिनट तक बातचीत हुई। बातचीत में केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि बड़े धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन, प्रशासनिक अनुभव, नेतृत्व और भारी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं को संभालने की क्षमता पर भी चर्चा हुई। मंदिर में एक दिन में लगभग 20,000 से लेकर पांच लाख तक लोगों की भीड़ को संभालने की क्षमता से जुड़े सवाल भी पूछे जाने की बात सामने आई है।

ट्रस्ट ने जुलाई में CEO पद के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। उस समय पद के लिए प्रशासन, बड़े धार्मिक संस्थानों या कॉरपोरेट गवर्नेंस का अनुभव रखने वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने की बात सामने आई थी।

CEO की नियुक्ति सिर्फ धार्मिक पद नहीं, प्रशासनिक जिम्मेदारी भी

राम मंदिर के बढ़ते आकार और श्रद्धालुओं की संख्या के साथ मंदिर का संचालन एक जटिल प्रशासनिक काम बन चुका है। इसमें भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा, दान और वित्तीय प्रबंधन, कर्मचारियों का संचालन, सुविधाओं का रखरखाव तथा विभिन्न एजेंसियों के साथ समन्वय जैसे काम शामिल हैं।

यही वजह है कि CEO पद को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से देखना अधूरा होगा। नियुक्त होने वाले अधिकारी को एक बड़े सार्वजनिक धार्मिक परिसर की तरह काम करने वाली संस्था के प्रशासनिक और वित्तीय तंत्र को संभालना होगा।

ट्रस्ट ने पहली बार इस तरह का पूर्णकालिक CEO पद बनाने का फैसला ऐसे समय में किया है जब मंदिर में चढ़ावे और दान की रकम के कथित गबन को लेकर जांच चल रही है। जुलाई में ट्रस्ट ने स्पष्ट रूप से CEO की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की और आवेदन मांगे।

दान विवाद के बाद बदला ट्रस्ट का प्रशासनिक ढांचा

CEO की नियुक्ति को समझने के लिए हालिया दान विवाद की पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण है।

जून में राम मंदिर में श्रद्धालुओं से प्राप्त दान और चढ़ावे की कथित हेराफेरी के मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस कार्रवाई एक FIR के बाद हुई, जिसे ट्रस्ट की शिकायत और विशेष जांच दल (SIT) की प्रारंभिक जांच से जुड़ी सिफारिशों के आधार पर दर्ज किया गया था।

इस विवाद के बीच ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे की भी पुष्टि हुई। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने कहा था कि संस्था मामले की तह तक जाने और जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रतिबद्ध है।

रॉयटर्स की जुलाई की रिपोर्ट के अनुसार, आठ आरोपियों से करीब 80 लाख रुपये की रकम बरामद होने की बात सामने आई थी, जबकि 31 मार्च तक ट्रस्ट को प्राप्त कुल दान कई अरब रुपये का था। इससे विवाद का एक बड़ा सवाल सामने आया—इतने बड़े धार्मिक संस्थान में नकदी और चढ़ावे के प्रबंधन की निगरानी कितनी मजबूत है?

धार्मिक पहचान बनाम प्रशासनिक योग्यता का सवाल

CEO चयन में उम्मीदवारों से धार्मिक आस्था और निजी जीवनशैली से जुड़े सवाल पूछे जाने की खबर ने एक अलग बहस को जन्म दिया है।

यदि किसी उम्मीदवार से यह पूछा जाता है कि वह जनेऊ पहनता है या नहीं, शराब पीता है या नहीं, शाकाहारी है या मांसाहारी, तो सवाल उठता है कि इन व्यक्तिगत आदतों को मंदिर के CEO के प्रशासनिक प्रदर्शन से किस तरह जोड़ा जा रहा है। दूसरी ओर, ट्रस्ट की दृष्टि से यह पद सामान्य कॉरपोरेट CEO की भूमिका से अलग है और मंदिर की धार्मिक परंपराओं तथा श्रद्धालुओं की अपेक्षाओं की समझ भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

उपलब्ध रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं है कि इन व्यक्तिगत सवालों को चयन के लिए औपचारिक पात्रता मानदंड बनाया गया है या वे केवल साक्षात्कार के दौरान उम्मीदवार की धार्मिक समझ और दृष्टिकोण जानने के लिए पूछे गए थे। इसलिए इन सवालों के आधार पर चयन समिति के अंतिम निर्णय के बारे में निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

असली परीक्षा होगी पारदर्शिता और प्रबंधन की

राम मंदिर के CEO के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल धार्मिक वातावरण को समझना नहीं होगी। उन्हें ऐसे प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करना होगा जिसमें दान की गिनती से लेकर रिकॉर्ड रखने और सुरक्षा तक हर प्रक्रिया स्पष्ट और जवाबदेह हो।

दान विवाद के बाद CEO पद का निर्माण इसी व्यापक संस्थागत सुधार का हिस्सा माना जा रहा है। ट्रस्ट ने पहले ही इस पद के लिए प्रशासनिक अनुभव और साफ रिकॉर्ड को महत्व देने की बात कही थी।

आगे यह देखअयोध्या में राम मंदिर के प्रशासन को अधिक पेशेवर ढांचे में लाने की कोशिश के बीच श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पहले पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के चयन की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच गई है। 5,200 से अधिक आवेदनों में से 18 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए चुना गया है। इनमें पूर्व IAS और IPS अधिकारियों के साथ-साथ पूर्व सैन्य अधिकारी और दक्षिण भारत के कुछ प्रमुख मंदिरों के प्रशासन से जुड़े लोग शामिल हैं।

लेकिन इस चयन प्रक्रिया ने प्रशासनिक क्षमता के साथ-साथ उम्मीदवारों की निजी धार्मिक जीवनशैली को लेकर पूछे जा रहे सवालों के कारण भी ध्यान खींचा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उम्मीदवारों से भगवान राम में उनकी आस्था, जनेऊ धारण करने, शिखा रखने, शाकाहारी या मांसाहारी होने और शराब का सेवन करने जैसे सवाल पूछे गए। साथ ही उनसे भीड़ प्रबंधन, नेतृत्व क्षमता और मंदिर के भविष्य के लिए उनकी कार्ययोजना पर भी सवाल किए गए।

18 उम्मीदवारों के बीच चयन, तीन नामों की होगी सिफारिश

CEO पद के लिए इंटरव्यू 11 और 12 अगस्त को अयोध्या में किए जाने की जानकारी सामने आई है। चयन समिति तीन नामों की सिफारिश करेगी, जिनमें से अंतिम उम्मीदवार का चयन ट्रस्ट करेगा। समिति में सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस प्रमोद कोहली, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल विष्णुकांत चतुर्वेदी और साईं बाबा संस्थान से जुड़े रहे सुरेश हावरे शामिल हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, कुछ उम्मीदवारों से 40 से 50 मिनट तक बातचीत हुई। बातचीत में केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि बड़े धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन, प्रशासनिक अनुभव, नेतृत्व और भारी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं को संभालने की क्षमता पर भी चर्चा हुई। मंदिर में एक दिन में लगभग 20,000 से लेकर पांच लाख तक लोगों की भीड़ को संभालने की क्षमता से जुड़े सवाल भी पूछे जाने की बात सामने आई है।

ट्रस्ट ने जुलाई में CEO पद के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। उस समय पद के लिए प्रशासन, बड़े धार्मिक संस्थानों या कॉरपोरेट गवर्नेंस का अनुभव रखने वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने की बात सामने आई थी।

CEO की नियुक्ति सिर्फ धार्मिक पद नहीं, प्रशासनिक जिम्मेदारी भी

राम मंदिर के बढ़ते आकार और श्रद्धालुओं की संख्या के साथ मंदिर का संचालन एक जटिल प्रशासनिक काम बन चुका है। इसमें भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा, दान और वित्तीय प्रबंधन, कर्मचारियों का संचालन, सुविधाओं का रखरखाव तथा विभिन्न एजेंसियों के साथ समन्वय जैसे काम शामिल हैं।

यही वजह है कि CEO पद को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से देखना अधूरा होगा। नियुक्त होने वाले अधिकारी को एक बड़े सार्वजनिक धार्मिक परिसर की तरह काम करने वाली संस्था के प्रशासनिक और वित्तीय तंत्र को संभालना होगा।

ट्रस्ट ने पहली बार इस तरह का पूर्णकालिक CEO पद बनाने का फैसला ऐसे समय में किया है जब मंदिर में चढ़ावे और दान की रकम के कथित गबन को लेकर जांच चल रही है। जुलाई में ट्रस्ट ने स्पष्ट रूप से CEO की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की और आवेदन मांगे।

दान विवाद के बाद बदला ट्रस्ट का प्रशासनिक ढांचा

CEO की नियुक्ति को समझने के लिए हालिया दान विवाद की पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण है।

जून में राम मंदिर में श्रद्धालुओं से प्राप्त दान और चढ़ावे की कथित हेराफेरी के मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस कार्रवाई एक FIR के बाद हुई, जिसे ट्रस्ट की शिकायत और विशेष जांच दल (SIT) की प्रारंभिक जांच से जुड़ी सिफारिशों के आधार पर दर्ज किया गया था।

इस विवाद के बीच ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे की भी पुष्टि हुई। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने कहा था कि संस्था मामले की तह तक जाने और जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रतिबद्ध है।

रॉयटर्स की जुलाई की रिपोर्ट के अनुसार, आठ आरोपियों से करीब 80 लाख रुपये की रकम बरामद होने की बात सामने आई थी, जबकि 31 मार्च तक ट्रस्ट को प्राप्त कुल दान कई अरब रुपये का था। इससे विवाद का एक बड़ा सवाल सामने आया—इतने बड़े धार्मिक संस्थान में नकदी और चढ़ावे के प्रबंधन की निगरानी कितनी मजबूत है?

धार्मिक पहचान बनाम प्रशासनिक योग्यता का सवाल

CEO चयन में उम्मीदवारों से धार्मिक आस्था और निजी जीवनशैली से जुड़े सवाल पूछे जाने की खबर ने एक अलग बहस को जन्म दिया है।

यदि किसी उम्मीदवार से यह पूछा जाता है कि वह जनेऊ पहनता है या नहीं, शराब पीता है या नहीं, शाकाहारी है या मांसाहारी, तो सवाल उठता है कि इन व्यक्तिगत आदतों को मंदिर के CEO के प्रशासनिक प्रदर्शन से किस तरह जोड़ा जा रहा है। दूसरी ओर, ट्रस्ट की दृष्टि से यह पद सामान्य कॉरपोरेट CEO की भूमिका से अलग है और मंदिर की धार्मिक परंपराओं तथा श्रद्धालुओं की अपेक्षाओं की समझ भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

उपलब्ध रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं है कि इन व्यक्तिगत सवालों को चयन के लिए औपचारिक पात्रता मानदंड बनाया गया है या वे केवल साक्षात्कार के दौरान उम्मीदवार की धार्मिक समझ और दृष्टिकोण जानने के लिए पूछे गए थे। इसलिए इन सवालों के आधार पर चयन समिति के अंतिम निर्णय के बारे में निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

असली परीक्षा होगी पारदर्शिता और प्रबंधन की

राम मंदिर के CEO के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल धार्मिक वातावरण को समझना नहीं होगी। उन्हें ऐसे प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करना होगा जिसमें दान की गिनती से लेकर रिकॉर्ड रखने और सुरक्षा तक हर प्रक्रिया स्पष्ट और जवाबदेह हो।

दान विवाद के बाद CEO पद का निर्माण इसी व्यापक संस्थागत सुधार का हिस्सा माना जा रहा है। ट्रस्ट ने पहले ही इस पद के लिए प्रशासनिक अनुभव और साफ रिकॉर्ड को महत्व देने की बात कही थी।

आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चयनित CEO को वास्तविक प्रशासनिक अधिकार कितने दिए जाते हैं। जुलाई में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक ट्रस्ट को CEO की शक्तियों और जिम्मेदारियों का दायरा भी तय करना है।

इसलिए नियुक्ति का महत्व केवल इस बात में नहीं होगा कि नया अधिकारी कौन है। ज्यादा अहम यह होगा कि वह मंदिर के प्रशासन को किस तरह की व्यवस्था में बदल पाता है—जहां धार्मिक परंपरा के साथ वित्तीय अनुशासन, पेशेवर प्रबंधन और श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा भी समान प्राथमिकता बने।ना महत्वपूर्ण होगा कि चयनित CEO को वास्तविक प्रशासनिक अधिकार कितने दिए जाते हैं। जुलाई में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक ट्रस्ट को CEO की शक्तियों और जिम्मेदारियों का दायरा भी तय करना है।

इसलिए नियुक्ति का महत्व केवल इस बात में नहीं होगा कि नया अधिकारी कौन है। ज्यादा अहम यह होगा कि वह मंदिर के प्रशासन को किस तरह की व्यवस्था में बदल पाता है जहां धार्मिक परंपरा के साथ वित्तीय अनुशासन, पेशेवर प्रबंधन और श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा भी समान प्राथमिकता बने।

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