दक्षिणी लेबनान में इजरायली हवाई हमलों में 11 की मौत, नाजुक युद्धविराम पर फिर उठे सवाल
दक्षिणी लेबनान में शनिवार को हुए इजरायली हवाई हमलों में कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई। इनमें अंसार गांव में एक घर पर हुए हमले में तीन बच्चों समेत सात लोग मारे गए। एक दूसरे हमले में चार लोगों की जान गई और 17 लोग घायल हुए। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय और सरकारी समाचार एजेंसी के अनुसार, ये हमले 20 जून को लागू हुए नाजुक युद्धविराम के बाद सबसे घातक रहे हैं।
हमलों का महत्व केवल मृतकों की संख्या तक सीमित नहीं है। ये उस समय हुए हैं जब इजरायल और लेबनान के बीच बातचीत के जरिए दक्षिणी लेबनान में लंबे समय से चल रहे संघर्ष को रोकने की कोशिश हो रही है। ऐसे में ताजा हिंसा ने उस प्रक्रिया की व्यवहारिकता और युद्धविराम की मजबूती पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
अंसार और देइर अल-ज़हरानी में क्या हुआ?
लेबनान की सरकारी समाचार एजेंसी के मुताबिक, अंसार गांव के बाहरी हिस्से में एक मकान को निशाना बनाया गया। हमले में सात लोगों की मौत हुई, जिनमें तीन बच्चे शामिल थे। शुरुआती रिपोर्ट में दो लोगों के घायल होने की जानकारी दी गई थी। देइर अल-ज़हरानी गांव में हुए दूसरे हमले में चार लोगों की मौत हुई और 17 लोग घायल हुए।
हमलों के बाद दक्षिणी लेबनान के कई हिस्सों में तनाव बढ़ गया। नबातियेह शहर की ओर जाने वाली प्रमुख सड़कों पर नजर रखने वाली रणनीतिक अली ताहेर पहाड़ी को भी निशाना बनाए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
इन इलाकों में जारी सैन्य गतिविधि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि युद्धविराम के बावजूद दक्षिणी लेबनान में इजरायली सैन्य उपस्थिति और हवाई हमले पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना UNIFIL ने पहले भी क्षेत्र में इजरायली सैन्य गतिविधियों और युद्धविराम के उल्लंघनों को लेकर चिंता जताई है।
लेबनान सरकार ने हमलों की निंदा की
लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने हमलों को दक्षिण में स्थिरता बहाल करने की कोशिशों के लिए नुकसानदेह बताया। उन्होंने कहा कि अंसार में मारे गए लोग सैन्य ढांचे का हिस्सा नहीं थे और मारे गए बच्चों तथा महिलाओं को सैन्य लक्ष्य नहीं माना जा सकता।
सलाम ने इजरायल से तनाव बढ़ाना बंद करने की अपील की। राष्ट्रपति जोसेफ आउन के कार्यालय की ओर से भी हमलों पर प्रतिक्रिया दी गई। उनके अनुसार, ये हमले बातचीत की प्रक्रिया और समझौते को लागू कराने के अमेरिकी प्रयासों के लिए एक स्पष्ट संदेश हैं।
लेबनान की आपत्ति उस व्यापक राजनीतिक सवाल को सामने लाती है जो युद्धविराम के बाद से बना हुआ है: दक्षिणी लेबनान की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसके पास होगी और क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई को रोकने की गारंटी कैसे दी जाएगी?
इजरायल का पक्ष: सैनिकों के खिलाफ कार्रवाई का जवाब
इजरायली सेना ने हमलों को अलग संदर्भ में पेश किया। उसके अनुसार, अली ताहेर और अंसार के आसपास हिजबुल्लाह के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया और यह कार्रवाई क्षेत्र में इजरायली सैनिकों के खिलाफ हुई एक घटना के जवाब में थी।
इजरायली सेना ने कहा कि वह हिजबुल्लाह को इजरायली नागरिकों या सैनिकों को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं देगी और खतरों को हटाने के लिए कार्रवाई जारी रखेगी।
हालांकि, शनिवार के हमलों के संदर्भ में हिजबुल्लाह ने तत्काल यह पुष्टि नहीं की कि उसने इजरायली सैनिकों के खिलाफ वह कार्रवाई की थी जिसका इजरायली सेना ने उल्लेख किया। बाद में संगठन ने इजरायल के हमलों की निंदा की और लेबनानी सरकार से उन्हें रोकने के लिए कदम उठाने का आह्वान किया।
इसलिए दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग रखना जरूरी है। इजरायल हमलों को सुरक्षा प्रतिक्रिया के रूप में देखता है, जबकि लेबनान सरकार और हिजबुल्लाह इन्हें युद्धविराम और लेबनानी संप्रभुता के खिलाफ कार्रवाई बताते हैं।
जून का समझौता क्यों महत्वपूर्ण है?
26 जून को इजरायल और लेबनान की सरकारों ने एक “फ्रेमवर्क एग्रीमेंट” की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य दक्षिणी लेबनान से इजरायली सैनिकों की वापसी और हिजबुल्लाह के हथियारों को लेबनानी राज्य के नियंत्रण में लाने की दिशा में आगे बढ़ना था। समझौते में दोनों देशों के बीच भविष्य में व्यापक शांति समझौते की दिशा में कदमों की भी बात थी।
लेकिन यहां सबसे बड़ी राजनीतिक अड़चन हिजबुल्लाह का रुख है। संगठन सीधे इजरायल के साथ बातचीत का हिस्सा नहीं बना और उसने हथियार छोड़ने से इनकार किया है। उसका तर्क है कि इजरायली सैनिकों की वापसी की पर्याप्त गारंटी के बिना लेबनान से निरस्त्रीकरण की मांग स्वीकार्य नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र लंबे समय से इस समस्या के समाधान के लिए सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 के पूर्ण क्रियान्वयन पर जोर देता रहा है। जून में संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता ने सभी पक्षों से हमले रोकने, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने और दक्षिणी लेबनान से इजरायली वापसी तथा लेबनानी राज्य के हथियारों पर एकाधिकार की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया था।
युद्धविराम के बावजूद हिंसा क्यों नहीं रुकी?
20 जून का युद्धविराम जमीन पर पूरी तरह शांत स्थिति में नहीं बदल पाया। शनिवार के हमले से पहले भी दक्षिणी लेबनान में हिंसा और सैन्य गतिविधि जारी रही थी।
6 जुलाई को नबातियेह फौका में हुए हमलों में चार लोगों की मौत हुई थी। इसके मुकाबले शनिवार की 11 मौतें युद्धविराम लागू होने के बाद सबसे अधिक थीं। युद्धविराम से ठीक एक दिन पहले, 19 जून को लेबनान में इजरायली हमलों में 83 लोगों की मौत और 141 लोगों के घायल होने की जानकारी स्वास्थ्य मंत्रालय ने दी थी।
संयुक्त राष्ट्र की निगरानी रिपोर्टों से भी पता चलता है कि दक्षिणी लेबनान में युद्धविराम के बावजूद सैन्य गतिविधियां जारी रही हैं। जून में UNIFIL ने इजरायली सैन्य गतिविधियों, हवाई क्षेत्र के उल्लंघनों और दोनों तरफ से प्रक्षेपास्त्रों की गतिविधि दर्ज की थी।
इसका सीधा असर उन नागरिकों पर पड़ता है जो अपने घरों में लौटने की कोशिश कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने जून में बताया था कि दक्षिणी लेबनान के कुछ हिस्सों में परिवारों की वापसी शुरू हुई थी, लेकिन कई लोग सुरक्षा स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार कर रहे थे।
Sources Used :
Lebanese Prime Minister’s Office — लेबनान की मानवीय स्थिति और युद्ध के प्रभाव पर प्रधानमंत्री नवाफ सलाम का आधिकारिक वक्तव्य।
Associated Press (AP) — 15 अगस्त 2026 की दक्षिणी लेबनान में इजरायली हवाई हमलों, 11 मौतों, लेबनानी और इजरायली प्रतिक्रियाओं तथा बातचीत की स्थिति पर रिपोर्ट।
United Nations — इजरायल-लेबनान युद्धविराम, UNIFIL की निगरानी और सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1701 के क्रियान्वयन से संबंधित आधिकारिक बयान।
Israel Defense Forces (IDF) — दक्षिणी लेबनान में सैन्य कार्रवाई और हिजबुल्लाह से उत्पन्न सुरक्षा खतरे पर इजरायली पक्ष की आधिकारिक स्थिति।
बातचीत के सामने अब सबसे बड़ी परीक्षा
लेबनान और इजरायल के बीच सात दौर की वार्ता हो चुकी है और सबसे हालिया बैठक रोम में हुई थी। लेकिन हिजबुल्लाह के निरस्त्रीकरण, इजरायली सैनिकों की वापसी और दक्षिणी लेबनान में राज्य के नियंत्रण जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।
ताजा हमलों के बाद अगला सवाल यह होगा कि क्या बातचीत जारी रह सकती है और क्या दोनों पक्ष जमीन पर ऐसे कदम उठाने को तैयार होंगे जो युद्धविराम को सिर्फ कागजी व्यवस्था के बजाय वास्तविक सुरक्षा व्यवस्था में बदल सकें।
यह जोखिम इसलिए भी बड़ा है क्योंकि मौजूदा संघर्ष पहले ही भारी मानवीय कीमत चुका चुका है। AP के अनुसार, 2 मार्च को मौजूदा युद्ध फिर तेज होने के बाद लेबनान में इजरायली हमलों में 4,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि इजरायली पक्ष में करीब 40 सैनिकों और तीन नागरिकों की मौत हुई है।
शनिवार का हमला इस बात की याद दिलाता है कि राजनीतिक समझौता घोषित होना और जमीन पर स्थायी शांति स्थापित होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। दक्षिणी लेबनान में नागरिकों के लिए वास्तविक बदलाव तभी दिखाई देगा जब सैन्य कार्रवाई में कमी, सुरक्षित वापसी और हथियारों तथा सीमा सुरक्षा को लेकर स्पष्ट व्यवस्था एक साथ आगे बढ़े।
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