Sukhbir Singh Badal after the Nanded attack, highlighting renewed questions over the 2015 Sikh political trust crisis

नांदेड़ हमले के बाद सुखबीर बादल के सामने पुराना सवाल: क्या 2015 का अविश्वास अब भी कायम है?

शिरोमणि अकाली दल (SAD) प्रमुख सुखबीर सिंह बादल पर नांदेड़ के एक गुरुद्वारे में हुआ हमला उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। लेकिन इस घटना का राजनीतिक महत्व इससे भी आगे जाता है। करीब डेढ़ साल के भीतर बादल पर धार्मिक स्थलों पर दो गंभीर हमले हो चुके हैं पहला दिसंबर 2024 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के बाहर और दूसरा 13 अगस्त 2026 को महाराष्ट्र के नांदेड़ में।

इन दोनों घटनाओं को एक ही कारण से जोड़ना अभी जल्दबाजी होगी। नांदेड़ हमले का मकसद जांच का विषय है और उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई स्थापित तथ्य नहीं है जो इसे 2015 के बेअदबी विवाद या बादल की राजनीतिक भूमिका से सीधे जोड़ता हो। फिर भी, बार-बार धार्मिक स्थलों पर उन्हें निशाना बनाए जाने से सुरक्षा के साथ-साथ उस पुराने राजनीतिक सवाल की वापसी हुई है—क्या सुखबीर बादल और अकाली दल ने सिख समुदाय के उन वर्गों का भरोसा पूरी तरह वापस हासिल कर लिया है, जो 2015 के बाद उनसे दूर हुए थे?

नांदेड़ में क्या हुआ?

13 अगस्त 2026 को नांदेड़ स्थित तख्त श्री हजूर साहिब परिसर में सुखबीर सिंह बादल पर धारदार हथियार से हमला किया गया। रिपोर्टों के अनुसार, हमलावर की पहचान 62 वर्षीय जसपाल सिंह के रूप में हुई है, जो कथित तौर पर पिछले करीब दो वर्षों से गुरुद्वारे में सेवादार के रूप में रह रहा था। सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल हस्तक्षेप किया और हमले को आगे बढ़ने से रोका। घटना में बादल को चोट लगी और एक सुरक्षा कर्मी भी घायल हुआ। आरोपी को हिरासत में लेकर जांच शुरू की गई है।

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घटना की विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज्ज सहित कई धार्मिक और राजनीतिक नेताओं ने हमले की निंदा की है।

इस घटना में सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल हमले की वजह है। जब तक जांच एजेंसियां आरोपी की मंशा और संभावित पृष्ठभूमि को स्पष्ट नहीं करतीं, तब तक इसे राजनीतिक या पंथक असंतोष का परिणाम बताना उचित नहीं होगा।

यही सावधानी इस पूरे मामले को समझने के लिए जरूरी है।

डेढ़ साल में दूसरी बड़ी घटना

नांदेड़ की घटना से पहले 4 दिसंबर 2024 को सुखबीर बादल पर अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के प्रवेश द्वार के बाहर गोली चलाने की कोशिश हुई थी। उस समय वह श्री अकाल तख्त साहिब द्वारा सुनाई गई धार्मिक सजा के तहत सेवा कर रहे थे।

नारायण सिंह चौरा ने बादल पर गोली चलाने की कोशिश की थी। सुरक्षा कर्मियों और वहां मौजूद लोगों ने हमलावर को काबू कर लिया। गोली बादल को नहीं लगी और वह सुरक्षित रहे। घटना के बाद चौरा को गिरफ्तार किया गया।

यह घटना इसलिए भी असाधारण थी क्योंकि बादल उस समय किसी राजनीतिक कार्यक्रम में नहीं, बल्कि धार्मिक दंड के तहत सेवा कर रहे थे। अगस्त 2024 में श्री अकाल तख्त साहिब ने उन्हें 2007 से 2017 के बीच SAD सरकार और पार्टी से जुड़ी “गलतियों” के लिए तनखैया घोषित किया था।

बादल ने अकाल तख्त के आदेश को स्वीकार किया और बाद में धार्मिक सजा के तहत सेवा की।

इस तरह 2024 की गोलीबारी और 2026 के नांदेड़ हमले के बीच एक महत्वपूर्ण समानता जरूर है—दोनों घटनाएं धार्मिक स्थलों पर हुईं। लेकिन समानता को कारण या साजिश का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

असली राजनीतिक पृष्ठभूमि 2015 से शुरू होती है

सुखबीर बादल के सामने मौजूद राजनीतिक चुनौती को समझने के लिए 2015 की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं और उसके बाद बहिबल कलां में हुई पुलिस फायरिंग ने तत्कालीन SAD-BJP सरकार की विश्वसनीयता को गहरा नुकसान पहुंचाया। उसी दौर में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को माफी दिए जाने का विवाद भी सामने आया, जिसे बाद में वापस लेना पड़ा।

इन घटनाओं का असर सिर्फ कानून-व्यवस्था की बहस तक सीमित नहीं रहा। SAD की राजनीति लंबे समय से सिख और पंथक हितों के प्रतिनिधित्व से जुड़ी रही है। इसलिए जब धार्मिक बेअदबी और उसके बाद की कार्रवाई को लेकर सवाल उठे, तो राजनीतिक जवाबदेही सीधे अकाली नेतृत्व तक पहुंची।

दिसंबर 2023 में सुखबीर बादल ने 2015 की बेअदबी की घटनाओं के दोषियों को पकड़ने में विफल रहने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी थी। उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार के कार्यकाल में हुई बेअदबी के लिए वह सिख समुदाय से क्षमा मांगते हैं।

इसके बाद 2024 में अकाल तख्त की प्रक्रिया और आगे बढ़ी। बादल ने पार्टी और सरकार की विभिन्न गलतियों को लेकर बिना शर्त माफी मांगी और धार्मिक दंड स्वीकार किया।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है।

धार्मिक प्रायश्चित और राजनीतिक विश्वास एक ही प्रक्रिया नहीं हैं।

अकाल तख्त के समक्ष माफी मांगी जा सकती है, धार्मिक दंड पूरा किया जा सकता है और सेवा की जा सकती है। लेकिन मतदाताओं का भरोसा किसी धार्मिक आदेश से स्वतः वापस नहीं आता। वह राजनीतिक व्यवहार, नेतृत्व और समय के साथ बनता है।

क्या धार्मिक माफी राजनीतिक माफी भी है?

यही वह प्रश्न है जो नांदेड़ की घटना के बाद फिर सामने आया है।

यह कहना गलत होगा कि सिख समुदाय का बड़ा हिस्सा आज भी सुखबीर बादल के खिलाफ है। ऐसा दावा करने के लिए व्यापक और विश्वसनीय जनमत के प्रमाण चाहिए। इसी तरह किसी एक व्यक्ति के हमले या किसी वायरल वीडियो को पूरे समुदाय के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं माना जा सकता।

लेकिन यह भी उतना ही गलत होगा कि 2015 की घटनाओं का राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो चुका है।

SAD के भीतर नेतृत्व और पंथक राजनीति को लेकर असंतोष पहले भी सामने आया है। 2024 में पार्टी के बागी नेताओं ने अकाल तख्त के सामने पेश होकर तत्कालीन SAD सरकार की गलतियों के लिए माफी मांगी थी।

इससे संकेत मिलता है कि विवाद केवल विपक्षी दलों की आलोचना तक सीमित नहीं था; अकाली राजनीति के भीतर भी नेतृत्व और जवाबदेही पर गंभीर मतभेद मौजूद रहे हैं।

2027 की परीक्षा अलग होगी

सुखबीर बादल के लिए यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब SAD 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहा है।

फरवरी 2026 में बादल ने ‘पंजाब बचाओ’ अभियान के जरिए विधानसभा चुनाव का बिगुल बजाया था। मार्च में उन्होंने दावा किया कि SAD अकेले चुनाव लड़कर बड़ी जीत हासिल करेगा। इसी दौरान पार्टी ने पंथक वोटों को फिर से अपने पक्ष में संगठित करने की कोशिश भी तेज की।

इसलिए नांदेड़ हमले के बाद सुरक्षा का सवाल तत्काल है, लेकिन राजनीतिक रूप से बड़ा सवाल अलग है: क्या SAD अपने पारंपरिक पंथक आधार के साथ वह संबंध दोबारा बना पाया है, जो 2015 के बाद कमजोर हुआ था?

2027 का चुनाव इस सवाल का ज्यादा ठोस जवाब दे सकता है।

अगर पार्टी अपने पारंपरिक समर्थन आधार को मजबूत करती है, तो यह संकेत होगा कि माफी, धार्मिक सेवा और संगठनात्मक पुनर्निर्माण ने कुछ हद तक असर डाला है। अगर ऐसा नहीं होता, तो यह तर्क मजबूत होगा कि धार्मिक प्रायश्चित के बावजूद राजनीतिक विश्वास की कमी बनी हुई है।

यह अनुमान नहीं, बल्कि आने वाले चुनाव में देखने योग्य राजनीतिक संकेतक है।

Sources Used

The Times of India — नांदेड़ में सुखबीर बादल पर 13 अगस्त 2026 के हमले और आरोपी जसपाल सिंह की पहचान से संबंधित रिपोर्ट।

हमले और राजनीति को अलग रखना होगा

सुखबीर बादल की राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है। 2015 की घटनाओं को लेकर जवाबदेही की मांग भी वैध राजनीतिक बहस है।

लेकिन किसी भी राजनीतिक या धार्मिक असहमति को हिंसा का आधार नहीं बनाया जा सकता।

नांदेड़ हमले के मामले में जांच एजेंसियों को सबसे पहले हमलावर की मंशा, उसकी पृष्ठभूमि और घटना की सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों को स्पष्ट करना होगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि उच्च सुरक्षा प्राप्त राजनीतिक नेता तक हमलावर कैसे पहुंचा।

दूसरी तरफ, SAD के लिए राजनीतिक चुनौती किसी पुलिस जांच से खत्म नहीं होगी। पार्टी को पंजाब में अपनी विश्वसनीयता, पंथक पहचान और नेतृत्व को लेकर उठे सवालों का जवाब राजनीतिक स्तर पर देना होगा।

सुखबीर बादल ने धार्मिक प्रायश्चित की प्रक्रिया पूरी की है। अब उनके सामने दूसरी, कहीं अधिक कठिन प्रक्रिया है राजनीतिक भरोसा वापस हासिल करना।

और इस भरोसे का अंतिम फैसला किसी धार्मिक संस्था या पार्टी कार्यालय में नहीं, बल्कि पंजाब के मतदाताओं के बीच होगा।

राहुल गांधी के ‘हग’ वाले तंज पर BJP का पलटवार, प्रह्लाद जोशी बोले- ‘कब बड़े होंगे?

Dehradun Tunnel Rescue: CM धामी ने की रेस्क्यू की समीक्षा

चमोली में निर्माणाधीन हाइड्रोपावर टनल हादसा: 7 मजदूरों की मौत, एक लापता; बचाव अभियान जारी


More From Author

Uttarakhand Weather 17 अगस्त तक बारिश, 3 जिलों में Alert

Uttarakhand Weather: 17 अगस्त तक बारिश, 3 जिलों में Alert

Awarapan 2 advance booking में Emraan Hashmi, फिल्म के ओपनिंग डे पर 20 करोड़ रुपये तक की कमाई का अनुमान

Awarapan 2 की एडवांस बुकिंग ने बढ़ाई उम्मीदें, ओपनिंग डे पर 20 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान