Naxalism in india : भारत में दशकों से आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा माओवाद (नक्सलवाद) अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त रणनीति, सुरक्षा बलों के निर्णायक अभियानों और आत्मसमर्पण योजनाओं के असर से माओवादियों का नेटवर्क तेजी से कमजोर हुआ है। हिंसा की घटनाओं में गिरावट आई है और प्रभावित जिलों की संख्या लगातार घट रही है।

शीर्ष नेतृत्व का आत्मसमर्पण: संगठन की कमर टूटी
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में माओवादी केंद्रीय कमेटी सदस्य दामोजी और उनकी पत्नी सोमजी के आत्मसमर्पण ने संगठन को बड़ा झटका दिया है। इसके साथ ही झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी बड़ी संख्या में माओवादी हथियार डाल रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में 17 अक्टूबर को 210 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, जिसमें कई शीर्ष नेता शामिल थे — जैसे उषा कंचन, भास्कर उर्फ शंकर, मधु, माहेंद, सचिन उर्फ सत्यम और पूर्व बस्तर सचिव निर्मल। इसे अब तक का देश का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण माना जा रहा है।
वर्ष 2025 के मई तक, 312 माओवादी मुठभेड़ों में मारे गए और 1,600 से अधिक आत्मसमर्पण कर चुके हैं — यह आंकड़े स्पष्ट रूप से संगठन की निराशा और विफलता को दिखाते हैं।
सुधारात्मक निर्णय भी नाकाम साबित
फरवरी 2024 में माओवादी केंद्रीय कमेटी ने संगठन को बचाने के लिए “सुधारक तरीके” अपनाने का निर्णय लिया था। लेकिन इन प्रयासों के बावजूद पार्टी टूटने से नहीं बच सकी। कई वरिष्ठ नेता आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जबकि बाकी अपने ठिकाने छोड़ रहे हैं।
मई 2025 में पार्टी महासचिव बसवराजू की नारायणपुर में हुई मुठभेड़ में मौत और किस्तैया की गिरफ्तारी ने संगठन को पूरी तरह कमजोर कर दिया है।
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आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास योजना
सरकार अब आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के पुनर्वास पर विशेष ध्यान दे रही है। इसके लिए कई नई योजनाएँ लागू की जा रही हैं ताकि वे मुख्यधारा में लौट सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें।
पुनर्वास योजनाओं की प्रमुख बातें
वित्तीय सहायता और रोजगार: आत्मसमर्पण करने वालों को नकद प्रोत्साहन, कौशल प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं में रोजगार के अवसर दिए जा रहे हैं।
घर और जमीन: पुनर्वास योजना के तहत आत्मसमर्पित माओवादियों को घर और खेती के लिए जमीन दी जा रही है।
सामाजिक पुनर्वास: समाज में उनकी पुनः स्वीकार्यता के लिए सामाजिक कार्यक्रम और शिक्षा योजनाएँ शुरू की गई हैं।
आत्मसमर्पण के बाद नया जीवन
कई पूर्व माओवादियों ने अब शांतिपूर्ण और सामान्य जीवन की राह चुन ली है। वे खेती-किसानी और सामाजिक कार्यों में जुटे हैं। जैसे पूर्व माओवादी नेता नरेश, जिन्होंने आत्मसमर्पण के बाद सामाजिक विकास कार्यों में हिस्सा लेना शुरू किया है। इन लोगों ने स्वीकार किया है कि उनका संगठन “गलत रास्ते” पर था और अब वे समाज के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं।
अभी भी बाकी हैं कुछ चुनौतियां
हालांकि माओवाद अपने अंतिम चरण में है, लेकिन कुछ चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं
आदिवासी अधिकारों का सवाल: कुछ पूर्व माओवादी अब भी आदिवासियों के अधिकारों के मुद्दे को लेकर सक्रिय हैं। इन्हें मुख्यधारा में पूरी तरह शामिल करने में समय लग सकता है।
बुनियादी सुविधाओं की कमी: माओवाद प्रभावित इलाकों में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं अब भी अधूरी हैं। सरकार इन इलाकों में विकास कार्यों को तेज़ी से बढ़ा रही है।
सरकार की आक्रामक रणनीति, विकास कार्यों की निरंतरता और आत्मसमर्पण नीतियों ने माओवादी संगठन की जड़ें हिला दी हैं। अब चुनौती यह है कि आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों का सही तरीके से पुनर्वास किया जाए और प्रभावित इलाकों में विकास की रफ्तार बनाए रखी जाए। यह कहा जा सकता है कि माओवाद अब अपने अंतिम अध्याय में है — और भारत जल्द ही इस आंतरिक खतरे से मुक्त होने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है।

