Delhi Red Fort Blast: राजधानी दिल्ली के लाल किला इलाके में पिछले साल 10 नवंबर को हुए कार ब्लास्ट मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। NIA ने कोर्ट में दाखिल अपनी चार्जशीट में बताया है कि आतंकियों ने बम (IED) और रॉकेट बनाने से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल चैटजीपीटी और यूट्यूब का इस्तेमाल किया था।
NIA ने 14 मई को विशेष अदालत में 7,500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। इसमें बताया गया है कि कैसे आतंकियों ने तकनीक का गलत इस्तेमाल कर देश के खिलाफ बड़ी साजिश रची।
अल-कायदा से जुड़ा है आतंकी मॉड्यूल
जांच एजेंसी के अनुसार, मुख्य आरोपी जासिर बिलाल वानी कथित तौर पर आतंकी संगठन अंसार गजवत-उल-हिंद (AGUH) से जुड़ा था, जिसका संबंध अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) से बताया गया है। NIA का दावा है कि जासिर मॉड्यूल का ‘इन-हाउस इंजीनियर’ बन गया था। वह तकनीक और इंटरनेट की मदद से हथियार तैयार कर रहा था।
साजिश में शामिल थे तीन डॉक्टर
इस मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि पढ़े-लिखे लोग भी इस साजिश का हिस्सा बताए गए हैं। हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी कैंपस का इस्तेमाल आतंकियों को तकनीकी मदद देने के लिए किया गया था।
जांच के मुताबिक, डॉ. अदील अहमद राथर ने पोटेशियम नाइट्रेट जैसी विस्फोटक सामग्री जुटाने में मदद की। वहीं, डॉ. उमर उन नबी को विस्फोटक से भरी कार का चालक बताया गया है, जिससे लाल किले के पास धमाका हुआ था। इस धमाके में 11 लोगों की मौत हुई थी। NIA के अनुसार, डॉ. उमर ने ही जसिर को दो ड्रोन भी दिए थे।
साथ ही, डॉ. मुज़म्मिल शकील पर भी इस साजिश में तकनीकी सहायता देने का आरोप है।
ऑनलाइन मंगाया सामान
जांच में पता चला है कि आरोपी जसिर ने दिसंबर 2023 से जनवरी 2024 के बीच शॉपिंग वेबसाइट फ्लिपकार्ट से कई इलेक्ट्रॉनिक सामान ऑर्डर किए थे। इनमें रिमोट कंट्रोल किट, सेंसर, सोल्डरिंग टूल और स्विच शामिल थे, जिनका इस्तेमाल बम के टाइमर और ट्रिगर बनाने में किया गया। इन सामानों को खरीदने के लिए कथित तौर पर पैसे डॉ. उमर ने दिए थे।
बम बनाने के बाद आरोपियों ने जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के काजीगुंड और यूसमर्ग के जंगलों में रॉकेट और सिलेंडर बम का परीक्षण भी किया था। NIA की टीम ने वहां से विस्फोटकों के अवशेष बरामद करने का दावा किया है।
खतरनाक केमिकल का हुआ इस्तेमाल
NIA के मुताबिक, लाल किले के पास हुए ब्लास्ट में TATP (ट्राई एसीटोन ट्राई पेरॉक्साइड) नाम के खतरनाक विस्फोटक का इस्तेमाल किया गया था। आरोपियों ने अलग-अलग केमिकल मिलाकर इसे लैब की तरह तैयार किया था।
जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों की योजना ड्रोन की क्षमता बढ़ाकर उनमें विस्फोटक फिट करने और कश्मीर समेत देश के अन्य सुरक्षा ठिकानों पर हमला करने की थी।
एजेंसी का कहना है कि यह मामला दिखाता है कि अपराधी इंटरनेट और AI तकनीक का गलत इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं। फिलहाल मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।
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