वाराणसी में वंदे भारत ट्रेन, हवाई जहाज के पार्ट्स और टर्बाइन निर्माण के साथ काशी को औद्योगिक हब के रूप में दर्शाती तस्वीर।

वाराणसी बनेगा इंडस्ट्रियल हब: अब वंदे भारत के इंजन, हवाई जहाज के पार्ट्स और टर्बाइन भी काशी में बनेंगे

वाराणसी | 7 सितंबर 2026: काशी की पहचान अब केवल मंदिरों, घाटों और पर्यटन तक सीमित नहीं रहने वाली है। वाराणसी में जिस तरह रेलवे, भारी इंजीनियरिंग, औद्योगिक उत्पादन और लॉजिस्टिक्स से जुड़े निवेश बढ़ रहे हैं, उससे बनारस के एक बड़े इंडस्ट्रियल और मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरने की तस्वीर साफ होती जा रही है।

हालांकि, यहां एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। “वंदे भारत के इंजन” को लेकर इस्तेमाल किया जा रहा दावा थोड़ा भ्रामक हो सकता है, क्योंकि वंदे भारत एक ट्रेनसेट है और पारंपरिक अर्थों में अलग इंजन वाली ट्रेन नहीं है। लेकिन वाराणसी में रेल प्रोपल्शन और रेल-कंपोनेंट निर्माण से जुड़ा औद्योगिक आधार जरूर विकसित हो रहा है। BHEL के कर्कियांव सेंटर में प्रोपल्शन मैन्युफैक्चरिंग ब्लॉक के निर्माण का आधिकारिक टेंडर भी इसका प्रमाण है।

मेरी नजर में असली खबर यही है कि काशी धीरे-धीरे परंपरागत व्यापारिक शहर से हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की तरफ बढ़ रही है।

काशी में औद्योगिक बदलाव की शुरुआत कहां से हुई?

वाराणसी में औद्योगिक गतिविधियां कोई नई बात नहीं हैं। बनारसी साड़ी, हस्तशिल्प, पीतल और लकड़ी के काम से लेकर छोटे और कुटीर उद्योग तक यहां की अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।

अब जोर ऐसे उद्योगों पर है जिनमें आधुनिक मशीनरी, इंजीनियरिंग, तकनीकी कौशल और बड़े सप्लाई चेन नेटवर्क की जरूरत होती है।

कर्कियांव औद्योगिक क्षेत्र इसका महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां BHEL का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस मौजूद है और कंपनी ने Propulsion Manufacturing Block के निर्माण के लिए आधिकारिक प्रक्रिया शुरू की थी।

यह केवल एक भवन बनाने की बात नहीं है। प्रोपल्शन किसी भी आधुनिक रेल और औद्योगिक प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसलिए ऐसी क्षमता का वाराणसी में विकसित होना स्थानीय इंजीनियरिंग और सप्लायर नेटवर्क के लिए बड़ा अवसर पैदा कर सकता है।

BHEL की मौजूदगी क्यों महत्वपूर्ण है?

अगर मैं वाराणसी के औद्योगिक बदलाव की कहानी को एक जगह से जोड़ूं, तो BHEL की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में दिखाई देती है।

BHEL पहले से ही वाराणसी में Heavy Equipment Repair Plant और कर्कियांव में अपने औद्योगिक केंद्र के जरिए मौजूद है। कंपनी ने कर्कियांव में इलेक्ट्रोलाइजर पैकेज के उपकरणों को इंटीग्रेट करने के लिए नई मैन्युफैक्चरिंग सुविधा स्थापित करने की योजना भी दस्तावेजों में दर्ज की है। इसका संबंध भारत के उभरते हाइड्रोजन इकोसिस्टम से है।

यानी एक तरफ रेल और प्रोपल्शन से जुड़ी क्षमता विकसित हो रही है, तो दूसरी तरफ ऊर्जा और ग्रीन-टेक्नोलॉजी से जुड़े उपकरणों की दिशा में भी संभावनाएं बन रही हैं।

यही विविधता किसी शहर को केवल एक फैक्ट्री वाला औद्योगिक क्षेत्र नहीं, बल्कि इंडस्ट्रियल क्लस्टर बनाती है।

बनारस रेल मैन्युफैक्चरिंग में कितना आगे बढ़ा?

रेलवे के क्षेत्र में वाराणसी का सबसे बड़ा नाम Banaras Locomotive Works यानी BLW है।

2025-26 में BLW ने 572 लोकोमोटिव का उत्पादन किया, जो पिछले वित्त वर्ष के 477 लोकोमोटिव से करीब 20 प्रतिशत ज्यादा था। इसमें 558 इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव भी शामिल थे। रेलवे ने 2026-27 के लिए BLW को 642 लोकोमोटिव का उत्पादन लक्ष्य दिया है।

यह आंकड़ा बताता है कि वाराणसी में भारी रेल इंजीनियरिंग की क्षमता पहले से मौजूद है और उसे लगातार बढ़ाया जा रहा है।

इतना ही नहीं, BLW केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है। फरवरी 2026 में उसने मोजाम्बिक के लिए 3,300 हॉर्सपावर के AC-AC डीजल-इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव की खेप पूरी की। BLW के अनुसार, उसने अब तक 11 देशों को 182 लोकोमोटिव निर्यात किए हैं।

मेरे लिए यह आंकड़ा खास है, क्योंकि किसी शहर को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए सिर्फ उत्पादन क्षमता नहीं, बल्कि निर्यात योग्य गुणवत्ता भी जरूरी होती है।

क्या वंदे भारत के इंजन भी बनेंगे?

यहां थोड़ी सावधानी जरूरी है।

वंदे भारत पारंपरिक इंजन-खींचने वाली ट्रेन नहीं है। इसलिए “वंदे भारत के इंजन बनेंगे” कहना तकनीकी रूप से सही शब्दावली नहीं है।

लेकिन वाराणसी में रेल प्रोपल्शन और लोकोमोटिव मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता का विस्तार जरूर हो रहा है। BHEL का कर्कियांव प्रोपल्शन मैन्युफैक्चरिंग ब्लॉक इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

इसका मतलब यह है कि भविष्य में वाराणसी का औद्योगिक आधार केवल पारंपरिक लोकोमोटिव उत्पादन तक सीमित न रहकर रेल प्रोपल्शन, इलेक्ट्रिकल सिस्टम और दूसरे हाई-टेक रेल कंपोनेंट्स की सप्लाई चेन से जुड़ सकता है।

यही वह बदलाव है जिसे “बनारस का इंडस्ट्रियल हब बनना” कहा जा रहा है।

Source to be used: Amar Ujala


हवाई जहाज के पार्ट्स और एयरोस्पेस सेक्टर की संभावना

एयरोस्पेस क्षेत्र में भी वाराणसी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए संभावनाएं बन रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की निवेश नीति में विमान निर्माण, असेंबली और MRO यानी Maintenance, Repair and Overhaul को निवेश के अवसर के रूप में चिन्हित किया गया है। सरकार की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, वाराणसी और प्रयागराज जैसे शहरों में एयर कार्गो की संभावनाएं भी मौजूद हैं।

लेकिन यहां भी यह अंतर समझना जरूरी है कि वाराणसी में अभी बड़े पैमाने पर विमान के पूरे हिस्सों का उत्पादन शुरू हो चुका है, ऐसा दावा उपलब्ध आधिकारिक स्रोतों से साबित नहीं होता।

फिर भी एयरोस्पेस सप्लाई चेन में CNC machining, precision engineering, electrical systems, fabrication और specialized components जैसी गतिविधियों के लिए बड़ा अवसर है।

उत्तर प्रदेश में पहले से Defence Industrial Corridor विकसित किया जा रहा है। इसमें लखनऊ, कानपुर, झांसी, आगरा-अलीगढ़ और चित्रकूट जैसे छह प्रमुख नोड हैं और IIT-BHU को भी Centre of Excellence से जोड़ा गया है।

इसका फायदा वाराणसी के आसपास विकसित हो रहे इंजीनियरिंग और MSME नेटवर्क को भविष्य में मिल सकता है।

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