इस सुपरमून को ‘बीवर मून’ भी कहा जाता है। यह नाम उत्तरी अमेरिका की स्थानीय जनजातियों से आया है। पुराने समय में इस पूर्णिमा के दौरान बीवर यानी जलचूहे सर्दियों के लिए अपने घर (मांद) बनाते थे, और शिकारी बर्फ जमने से पहले नदी किनारे जाल लगाते थे। इसलिए इस पूर्णिमा को बीवर मून कहा गया।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब चांद पृथ्वी के पास के बिंदु ‘पेरिजी’ पर होता है और उसी समय पूर्णिमा होती है, तो वह सुपरमून कहलाता है। हालांकि हर सुपरमून एक जैसा नहीं होता, कुछ ज्यादा चमकीले होते हैं, तो कुछ थोड़ा कम।
चार नवंबर की रात आसमान में यह अद्भुत नजारा साफ दिखाई देगा। अगर मौसम ठीक रहा, तो यह चांद ठंडी पतझड़ की रात को दिन जैसा उजाला दे देगा और देखने वालों के लिए यादगार पल बन जाएगा।
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